पुस्तक समीक्षा: और देश बंट गया

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अपनी पुस्तक में शेषाद्री जी ने भारत के विभाजन की कई एतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया है। पुस्तक के द्विराष्ट्र सिध्दांत का बीजारोपण में वह लिखते है कि 30 दिसंबर 1906 को जब लॉर्ड मिंटो के आशीर्वाद से मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तभी लीग का घोषित लक्ष्य झलक गया था।

प्रख्यात विचारक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक एवं भारतीय इतिहास के मनीषी होन्गासान्द्रा वेण्कटरमइया शेषाद्री जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा। संघ के कार्यकर्ताओं के बीच वह हो.वे. शेषाद्री के नाम से लोकप्रिय थे। भारतीय स्वाधीनता संघर्ष, सत्ता हस्तांतरण और देश विभाजन पर शेषाद्री जी की पुस्तक “ और देश बट गया ” में तथ्यपरक तरीके एवं पूरी निष्पक्षता के साथ भारत के विभाजन पर प्रकाश डाला गया है।

“और देश बट गया” पुस्तक में शेषाद्री जी ने भारत के विभाजन की त्रासदी का वर्णन किया है। इस पुस्तक में कुल 27 अध्याय है। जिनमें स्वाधीनता संग्राम की निर्णायक घड़ी, हिंदू मनोबल पर कुठाराघात, मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहन, बंग-भंग, व्दिराष्ट्र सिध्दांत का बीजारोपण, राष्ट्र जाग उठा, कांग्रेसः तुष्टिकरण के फेर में, खिलाफत आंदोलनः एक भंयकर भूल, खिलाफत के कड़वे फल, धर्मान्तरण और दंगों का बोलबाला, मुस्लिम मांगः अतृप्त पिपासा, सांप्रदायिक निर्णय, दस्यु-शैली लीग को रास आयी, राष्ट्रीय प्रतीकों पर समझौता, बाल्कन- जैसे प्रदेश बनाने की योजना, कांग्रेस ने जिन्ना को आकाश चढ़ाया, भारत ज्वालामुखी के मुख परः ब्रिटेन वापसी की तैयारी में, लीग की सीधी कार्रवाई, पूर्ण गतिरोध, विभाजन के लिए नेता मानसिक रूप से तैयार, विभाजन की स्वीकृति, भारत के साथ छल, भयंकर विनाश-सब कुछ स्वाहा, राज्यों के विलय की चुनौती, क्या विभाजन अनिवार्य था, विषैले बीज और स्वप्न तो साकार होगा जैसे महत्वपूर्ण अध्याय शामिल है।

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“और देश बट गया” पुस्तक के मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहन अध्याय में शेषाद्री जी लिखित है कि सर सैयद अपने समय में ब्रिटिश साम्राज्य का वफादार सेवक था। सर सैयद का मानना था कि भारतीय मुसलमानों का कल्याण अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिम सभ्यता को ग्रहण करने में ही है। सर सैयद ने बाइबल पर एक टीका भी निकाली थी ताकि ईसा का संदेश धूमिल न होने पाए। सर सैयद के अनुसार ईसाई और मुसलमान ओल्ड टेस्टामेंट के एक ही उपासना कुल के सदस्य थे। शेषाद्री जी ने सर सैयद के दोहरे चरित्र का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब उन्हें हिंदूओ से समर्थन जुटाना होता तो वह हिंदू मुसलमानों को भारतीय वधु की दो सुंदर आंखे बताते थे और जब वह मुस्लिमों के बीच जाते तो वहां लड़ाकू मुद्रा में गृह-युध्द की धमकी देते थे।

अपनी पुस्तक में शेषाद्री जी ने भारत के विभाजन की कई एतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया है। पुस्तक के द्विराष्ट्र सिध्दांत का बीजारोपण में वह लिखते है कि 30 दिसंबर 1906 को जब लॉर्ड मिंटो के आशीर्वाद से मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तभी लीग का घोषित लक्ष्य झलक गया था।

“और देश बट गया” पुस्तक में शेषाद्री जी ने लिखा हैं कि कांग्रेस किस तरह आरंभ से मुस्लिम तुष्टिकरण में जुटी थी। कांग्रेसः मुस्लिम तुष्टिकरण के फेर में नामक अध्याय में शेषाद्री जी लिखते है कि कांग्रेस के सामने यह समस्या थी कि वह किस प्रकार मुसलमानों को अंग्रेजों के सम्मोहन से दूर करें। इसके लिए कांग्रेस ने अनेक तरह के प्रलोभन मुसलमानों को दिए। कांग्रेस अपने अधिवेशन में भाग लेने वाले मुस्लिम प्रतिनिधियों को किराया और अन्य यात्रा भत्ता देने लगी। और अधिवेशनों में मुस्लिम प्रतिनिधियों के लिए विशेष सुख-सुविधाओं की व्यवस्था की जाने लगी।

“और देश बट गया” पुस्तक के एक अन्य महत्वपूर्ण अध्याय खिलाफत आंदोलनः एक भंयकर भूल में शेषाद्री जी लिखते हैं कि खिलाफत आंदोलन के समय हिंदू मुस्लिम एकता का जमकर विरोध किया। उस दौर में खलीफा की प्रभुसत्ता का प्रभाव समस्त मुस्लिम जगत पर था। उसी समय सर सैयद ने मौलाना शिब्ली से एक लेख लिखवाकर सिध्द करने का प्रयास किया कि खलीफाओं की परंपरा तो चौथे खलीफा से ही समाप्त हो चुकी थी। जिन्ना ने भी खिलाफत आंदोलन का विरोध किया था। शेषाद्री जी इसी अध्याय में लिखते हैं कि मौलाना अबुल कलाम आजाद भी तुर्की की खलीफाशाही के प्रति निष्ठावान थे। उनका विचार था कि यह अंतरराष्ट्रीय इस्लाम के हित में था। उन्होंने यह भी कहा कि दारूल इस्लाम के क्षेत्रों पर जिन लोगों ने अधिकार कर लिया है उनके विरुध्द जेहाद करना मुसलमानों का महजबी दायित्व है।

पुस्तक के धर्मान्तरण और दंगों का बोलबाला अध्याय में शेषाद्री जी लिखते हैं कि स्वामी श्रध्दानंद हिंदूओं का धर्मांतरण रोकने के लिए शुध्दि आंदोलन चला रखा था। 1923 की पहली छमाही में संयुक्त प्रांत के कुछ भागों में 18 हजार से अधिक मुसलमान पुनः हिंदू बन गए। मुस्लिमों के साथ कांग्रेस के नेता भी स्वामी जी के इस शुध्दिकरण आंदोलन की निंदा में जुटे थे। 23 दिसंबर 1926 को स्वामी श्रध्दानंद जी अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम मिलने आया और उसने अपना रिवाल्वर निकाल कर स्वामी जी पर गोलियां बरसा दी। रशीद पकड़ा गया मगर उसके बचाव के लिए मुसलमानों ने काफी पैसा इकठ्ठा किया कांग्रेस के एक प्रमुख नेता आसफ अली ने अदालत में उसकी पैरवी की। पुस्तक में लिखा गया हैं कि कांग्रेस के गोहाटी अधिवेशन में महात्मा गांधी ने अब्दुल रशीद को भाई कहा। गांधी ने कहा कि मैं तो उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक दूसरे के विरुध्द घृणा फैलाई। 

“और देश बट गया” पुस्तक में शेषाद्री जी लिखते हैं कि किस तरह से मोहम्मद अली जिन्ना, जिन्नाभाई से कायदेआजम बन गए। शेषाद्री जी जिन्ना की खोखली राष्ट्रभक्ति की परते खोलते हुए लिखा कि जिस व्यक्ति ने कभी केंद्रीय धारासभा में कहा था मैं राष्ट्रवादी था, राष्ट्रवादी हूं और राष्ट्रवादी रहूंगा वह बाद में साफ कहने लगा कि पाकिस्तान का जन्म तो उसी दिन हो गया था जब सदियों पहले प्रथम हिंदू का धर्मांतरण इस्लाम में हुआ था। वह लिखते हैं कि मुस्लिम लीग और जिन्ना इस्लाम के नाम पर हाय-तौबा मचाने की चालें सफल सिध्द हुईं।

पुस्तक में हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाएं जाने को लेकर शेषाद्री जी लिखते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती, वीर सावरकर, बंकिमचंद्र, लोकमान्य तिलक, राजाजी और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नायकों ने यह प्रयत्न किया कि हिंदी जनसंपर्क की भाषा बने। परंतु मुस्लिम लीग इसे सहन न कर सकी। वह हाथ धोकर हिंदी के पीछे पड़ गई वह उसे हिंदू आधापत्य का प्रतीक कहने लगी। लीग ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि वह कांग्रेस से कभी सहयोग करेगी जब कांग्रेस हिंदी के स्थान पर उर्दू को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लेगी। 

“और देश बट गया” पुस्तक में शेषाद्री जी लिखते हैं कि वास्तव में इस बात के ठोस आधार हैं कि यदि हमारे नेता विभाजन का दृढ़ता के साथ विरोध करते तो स्थिति कुछ और ही होती। अखंड भारत को मान्यता मिलती और आंतरिक विक्षोभ भी टल जाता। ब्रिटेव की नई नीति ने जिन्ना को बांधकर रख दिया था। उसके अपने साथी जो सांप्रदायिक उन्माद में उसेस चिपके हुए थे कठोर वास्तविकता से टकराकर इधर-उधर भागने लगे थे।

“और देश बट गया” पुस्तक की भाषाशैली बहुत प्रभावशाली और स्पष्टता को समेटे हुए है। पुस्तक के लेखन हो.वे. शेषाद्री जी ने अनेक ग्रंथों, पुस्तकों एवं समाचार पत्रों के अध्ययन के उपरांत इस प्रभावशाली पुस्तक की रचना की है। भारत के विकास, शक्ति, प्रतिष्ठा एवं विश्वगुरु बनने के सपने को कैसे साकार किया जा सकता है। पुस्तक में इन बातों पर भी चर्चा की गई है। निश्चित रुप से शेषाद्री जी से महान विचारक की लेखनी से निकले शब्द इस पुस्तक की सार्थकता को बढ़ाने का काम कर रहे है।

“और देश बट गया” पुस्तक के अध्ययन करने के उपरांत हो.वे.शेषाद्री जी के विचार एवं उनकी भाषाशैली एवं उनके लेखन से जुड़े अनुभवों की जानकारी प्राप्त होती है। वर्तमान परिस्थितियों में यह पुस्तक पाठकों के लिए भी बेहद उपयोगी और ज्ञानवर्ध्दक है।

इस पुस्तक का मूल्य 200  रुपये है। आप एक बार यह पुस्तक अवश्य पढ़े। इस इस पुस्तक को खरीदने या और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए आप संपर्क कर सकते है -

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