परवरिश - खेल-खेल में बच्चों को सिखाएं

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 बच्चों को यदि कोई भी रचनात्मक, सृजनात्मक या अन्य बातें सिखानी हो तो उन्हें खेल के द्वारा ही सिखाना सबसे उचित रहता है, यदि कोई संदेश देना हो तो भी हम किसी खेल या कहानी का ही सहारा लेते हैं।

जब कभी हम बच्चों की बात करते हैं तो अक्सर हमें अपना बचपन याद आ जाता है। किस प्रकार हम बचपन में तरह-तरह के खेल खेला करते थे, यह बात बचपन में भले ही समझ में ना आती हो पर बड़े होते- होते हम इस बात को समझ जाते हैं कि हमने यह बात बचपन में खेले गए खेल के द्वारा ही सीखी थी।

अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चों को यदि कोई भी रचनात्मक, सृजनात्मक या अन्य बातें सिखानी हो तो उन्हें खेल के द्वारा ही सिखाना सबसे उचित रहता है, यदि कोई संदेश देना हो तो भी हम किसी खेल या कहानी का ही सहारा लेते हैं।

खेल से बच्चों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास तो होता ही है इसके अलावा उनके अंदर सहनशीलता, धैर्य और नए-नए विचार भी उत्पन्न होते है।

 रचनात्मकता के विभिन्न पहलू:-

1. समय-समय पर बच्चों से बात करना

बच्चों के साथ संवाद करते समय हमें उनके आयु वर्ग का ध्यान रखना चाहिए, यदि आप उनसे बात नहीं करेंगे तो बच्चे अपने मन की जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाएंगे, और हो सकता है वह आपसे खुलकर बात ना कर पाए। जो बच्चे चंचल स्वभाव के होते हैं वह तो बात कर लेते हैं लेकिन कुछ बच्चे शर्मीले या शांत स्वभाव के होते हैं जिनके अंदर झिझक ज्यादा होती है ऐसे बच्चों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

 2- उनसे प्रश्न पूछना

बच्चों से प्रश्न पूछ कर उनके उत्तर का इंतजार करना चाहिए तथा उन्हें बोलने का मौका भी देना चाहिए, जिससे कि उनकी मानसिक क्षमता भी बढे। चाहे वह गलत ही बोले, हो सकता है आप उनके उत्तर से संतुष्ट ना हो लेकिन उनके उत्तर को ध्यान पूर्वक सुनकर उन्हें शाबाशी देते हुए बताना चाहिए कि आपने बहुत अच्छा बोला लेकिन इसका उत्तर ऐसा भी हो सकता है।

3. बुद्धि परीक्षण

बच्चों को कुछ समस्याएं देनी चाहिए जिससे कि वह उसे सुलझाने में अपना स्वयं का दिमाग विकसित कर सकें, जैसे कुछ पहेली, पज़ल गेम इत्यादि। इसके लिए कुछ कार्डबोर्ड अलग-अलग रंगों के ब्लॉक आदि का प्रयोग भी किया जा सकता है।

4. बोलकर सिखाना

छोटे बच्चे अक्सर सुनकर सबसे ज्यादा सीखते हैं, इसलिए उन्हें कुछ भी सिखाने के लिए बोलकर सिखाना सबसे बेहतर होता है, जैसे:- यदि उन्हें गिनती सिखानी है तो 1,2,3 बैठो इसको गिनो,  2,3,4 चलो- चले बाजार, 4,5,6 सबसे मिलकर रहे। इस प्रकार से कविता के रूप में हम उन्हें जल्दी सीखा सकते हैं।

5. समय-समय पर प्रतियोगिताएं करवाना

बच्चों को सिखाने का सबसे सही तरीका है उन्हें समय-समय पर प्रतियोगिताओं के आयोजन द्वारा कुछ भी काम करने को कहना, इससे जिस बच्चे की रुचि जिस काम में होगी वह सामने आ जाती है, इसके अलावा एक समय सीमा के अंदर अपने काम को खत्म करने की क्षमता बढ़ती है।

6. धैर्य परीक्षण

खेल के द्वारा बच्चों के अंदर धैर्य का भी परीक्षण होता है, क्योंकि किसी भी खेल में एक पक्ष की हार और एक पक्ष की जीत निश्चित होती है, जिससे बच्चे को हारने के बाद धैर्य रखना आ जाता है तथा अगली बार वह जीतने के लिए प्रयत्न भी करता है।

7. टीम वर्क

किसी भी खेल को कोई भी अकेले नहीं खेल सकता उसे एक टीम की जरूरत होती है तथा जीतने के लिए टीम का एक साथ होना भी जरूरी है। खेल के द्वारा बच्चों के अंदर टीम में काम करना तथा अपनी टोली को साथ लेकर चलने कि कला का विकास भी होता है।

8. संस्कारों का ज्ञान

छोटी-छोटी कहानियों को खेल के द्वारा समझाने के लिए हम उन्हें कोई भी रोल प्ले करने के लिए तैयार कर सकते हैं, जैसे:- पर्यावरण संरक्षण, वन जीव हत्या। इस नाटक के द्वारा बच्चे कोई ना कोई पेड़ लगाएं और उसका संरक्षण करें, जिसका पेड़ अच्छा हरा- भरा रहेगा वह जीत जाएगा। इस तरह का एक कंपटीशन भी करवाया जा सकता है।

9. सेवा के कार्य

बच्चों के खेल-खेल में कुछ सेवा के कार्य भी करवाते रहना चाहिए जैसे कभी किसी मंदिर प्रांगण, स्कूल, अस्पताल आदि के स्थल पर ले जाकर कुछ स्वच्छता का काम करवाना इससे बच्चों के अंदर सेवा भाव भी उत्पन्न होगा, अपने से बड़ों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा घर में छोटे-मोटे काम भी करवाने चाहिए।

10. सामाजिक समरसता

बच्चों को एक साथ भोजन करवाना, कभी-कभी बच्चों को सेवा बस्ती में ले जाना, एक दूसरे की सहायता करना, किसी के घर जाकर कैसे शिष्टाचार निभाया जाता है इसके बारे में बताना जिससे कि उनका सामाजिक विकास भी हो सके।

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