आज दिल्ली में जिधर देखिए, भीड़ का रेला नजर आता है। पहले मुंबई को भागते हुए लोगों का शहर कहा जाता था। मुंबई के बारे में कहा जाता था कि वह लगातार जागती रहती है। लेकिन अब दिल्ली भी कुछ वैसी ही हो गई है। लेकिन दिल्ली एक दौर में ऐसी नहीं थी।
आज दिल्ली में जिधर देखिए, भीड़ का रेला नजर आता है। पहले मुंबई को भागते हुए लोगों का शहर कहा जाता था। मुंबई के बारे में कहा जाता था कि वह लगातार जागती रहती है। लेकिन अब दिल्ली भी कुछ वैसी ही हो गई है। लेकिन दिल्ली एक दौर में ऐसी नहीं थी।
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वाधीन हुआ, तब दिल्ली की पूरी जनसंख्या कितनी थी, यह जानकर आप चकित रह जाएंगे। तब दिल्ली की जनसंख्या थी कुल जमा छह लाख 96 हजार। दिल्ली की हस्ती महाभारत काल से लेकर मुगल काल तक केंद्रीय रही है। इसके बावजूद बीसवीं सदी की शुरूआत तक दिल्ली की आबादी करीब चार लाख ही थी। 1901 की जनगणना के मुताबिक तब दिल्ली पंजाब राज्य के महरौली जिले का हिस्सा थी। दिल्ली की आबादी में बढ़ोतरी साल 1911 के बाद तब होने लगी, जब अंग्रेजी सरकार ने दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की। इसके बावजूद कुल जमा 36 वर्षों में दिल्ली की आबादी में करीब तीन लाख ही बढ़ोतरी हुई। अब तो इस शहर की आबादी करीब दो करोड़ हो गई है और जानकारों का अनुमान है कि स्वाधीनता संग्राम की सौंवी वर्षगांठ यानी 2047 तक इसकी आबादी करीब तीन करोड़ 28 लाख हो जाएगी।
दिल्ली की आबादी में तेज वृद्धि स्वाधीनता के तत्काल बाद हुई। देश विभाजन की विभीषिका से दोनों तरफ के करीब एक करोड़ 46 लोगों को शरणार्थी बनना पड़ा। उसमें सबसे ज्यादा संख्या हिंदुओं की रही, जिन्हें पाकिस्तानी हिस्से से अत्याचार और लूटमार के चलते भारत आना पड़ा। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने दिल्ली में पनाह ली। इसी वजह से स्वाधीनता के सिर्फ चार वर्षों में ही दिल्ली की आबादी में तेज बढ़त देखी गई। 1951 की जनगणना के मुताबिक, दिल्ली की जनसंख्या चार सालों में बढ़कर 17 लाख 44 हजार हो गई।
जब दिल्ली को अंग्रेजों ने भारत की राजधानी बनाया तो इसकी शासन व्यवस्था पंजाब राज्य से ले ली और इसे संघीय शासन के अधीन कर दिया। तब प्रशासन का जिम्मा केंद्र द्वारा नियुक्त कमिश्नर को दिया जाता था।
जब आजादी मिली, तब दिल्ली की जिंदगी आज जैसी भागमभाग वाली नहीं थी। बेशक तब विभाजन की विभीषिका का दर्द ताजा था। लेकिन तब दिल्ली में तांगे चलते थे। करीब दो दशक पहले तक मोतिया खान से सदर बाजार तक तांगे चला करते थे। इसी तरह दिल्ली में फटफट चला करते थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दिनों में बनी भारी मोटरसाइकिलों की इंजन के साथ तिपहिया जैसी सीटें जोड़कर फटफट बनाया गया था। फटफट नाम चलते वक्त उससे निकलने वाली आवाज के चलते पड़ा था। करीब दो दशक तक दिल्ली में कनॉट प्लेस के मिंटो रोड के कोने से लेकर जामा मस्जिद और मोतीनगर से मोरी गेट तक फटफट चला करते थे।
आजादी मिलते समय तक दिल्ली में अंदरूनी सवारी के लिए ट्रॉम सेवा भी चलन में थी। ब्रिटिश राजा जॉर्ज षट्टम के प्रसिद्ध दिल्ली दरबार के लिए जब 1903 में दिल्ली साफ सफाई हो रही थी, उसी दौरान राजधानी में बिजली आई और उसके साथ ही दिल्ली में बिजली से चलने वाली ट्राम का आगमन हुआ। भले ही आज पुरानी दिल्ली इलाके के चांदनी चौक, चावड़ी बाजार की जमीन के नीचे मेट्रो और सड़कों पर चमचमाती गाडि़यां और रिक्शों का रेला नजर आता हो, लेकिन एक समय वहां ट्राम भी चला करती थी।
दिल्ली में बिजली, ट्रॉम और रेलवे लाइनों ने कई एकड़ जमीन को एक बस्ती में बदल दिया जो कि सन् 1903 क्षेत्रफल में ग्रेटर लंदन के समान और सन् 1911 में उससे भी कई गुना बड़ा था। गवर्नर-जनरल हेनरी हार्डिंग ने इस विस्मयकारी परिवर्तन के विषय में लिखा, जिसके परिणामस्वरूप ”जहां कभी मक्के के खेत हो थे वहां अब दस प्लेटफार्मों वाला एक बड़ा रेलवे स्टेशन, पोलो के दो मैदान और धंसी हुई जमीन पर बने छत वाले मकान थे।
सन् 1907 तक ट्राम ने अजमेरी गेट, पहाड़ गंज, सदर और सब्जी मंडी को चांदनी चौक और जामा मस्जिद से जोड़ दिया। दिल्ली शहर में ट्राम का फैलाव करीब 14 मील यानी करीब 24 किलोमीटर तक हो गया और इससे तीस हजारी और सब्जी मंडी क्षेत्र वाया चांदनी चौक, जामा मस्जिद, चावड़ी, लाल कुआं, कटरा बादियान और फतेहपुरी से जुड़ गया। दिल्ली में ट्राम सेवा 1960 में बंद कर दी और शहर में परिवहन के लिए इसके बाद बसों का विस्तार हुआ।
दिल्ली के इतिहासकार के रूप में प्रसिद्ध राजेंद्र लाल हांडा ने अपनी 'किताब दिल्ली में दस वर्ष' में 1940 से 1950 के बीच बदलती दिल्ली की जिंदगी के साथ ही राजनीतिक एवं सत्ता के गलियारों में हो रहे परिवर्तन के साथ ही शहर के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने आजादी की रात को दिल्ली में उमड़े जनसमूह और उसके उत्साह को अपनी आंखों से देखा था। अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा है- ''रात के लगभग दो बजे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू धारा सभा से निकल कर वायसराय भवन की ओर गवर्नर जनरल को आमंत्रित करने गए। स्वतंत्रता के उत्साह में भीड़ भी उनके पीछे-पीछे हो ली. खाली स्थान था ही नहीं और जनसमूह इतना बड़ा था कि यह पता लगाना असंभव था... कि लोग किधर जा रहे हैं।’
हांडा ने अपनी किताब में लिखा है, ‘कुछ देर बाद प्रधानमंत्री गवर्नर जनरल को साथ ले धारा सभा भवन में आ गए। उस समय लोगों का जोश चरम सीमा को पहुंच चुका था। नेताओं के अभिनंदन में बराबर नारे लगाए जा रहे थे। उस समय सभी कुछ नवीन और अपूर्व दिखाई देता था- अपूर्व समारोह, अपूर्व दृश्य, अपूर्व उत्साह, अपूर्व देशभक्त’...
दिल्ली के कनॉट प्लेस के बाबा खड़क सिंह मार्ग का मशहूर हनुमान मंदिर को कौन नहीं जानता। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी के दिन इस मंदिर में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। मशहूर इतिहासकार राज खन्ना ने अपनी किताब 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' में लिखा है कि उस दिन यानी 15 अगस्त, 1947। कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर में आम दिनों से ज्यादा गहमागहमी थी। हालांकि मंगलवार नहीं था, शनिवार भी नहीं था। हनुमान मंदिर के पुजारी पंडित सुरेश शर्मा का एक साक्षात्कार भी कुछ साल पहले छपा था, जिसमें उन्होंने अपने परिवार के बुजुर्गों से सुनी बात बताई है। उनके अनुसार, स्वाधीन होने के दिन सुबह से ही लोग पूजा-अर्चना के लिए आ रहे थे। सारे माहौल में उत्साह था। मंदिर में सुबह से ही भंडारे का भी कार्यक्रम था। हनुमान मंदिर से कुछ आगे गुरुद्वारा बंगला साहब है। 15 अगस्तर 1947 को उसे भी सजाया गया था।
भारत के स्वाधीनता के इतिहास पर मशहूर लेखक डोमिनिक लैपीयरे और लैरी कॉलिन्स ने किताब लिखी है, 'फ्रीडम एट मिडनाइट'। इसमें 14 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन का चित्रण करते हुए वे लिखते हैं- 'सैन्य छावनियों, सरकारी कार्यालयों, निजी मकानों आदि पर फहराते यूनियन जैक को उतारा जाना शुरू हो चुका था। 14 अगस्त को जब सूर्य डूबा तो देश भर में यूनियन जैक ने ध्वज-दण्ड का त्याग कर दिया, ताकि वह चुपके से भारतीय इतिहास के भूत-काल की एक चीज बन कर रह जाए। समारोह के लिए आधी रात को धारा सभा भवन पूरी तरह तैयार थी. जिस कक्ष में भारत के वायसरायों की भव्य ऑयल-पेंटिंग्स लगी रहा करती थीं, वहीं अब अनेक तिरंगे झंडे शान से लहरा रहे थे।'
लैपीयरे और कॉलिन्स ने लिखा है, '14 अगस्त की सुबह से ही देश के शहर-शहर, गांव-गांव में जश्न शुरू हो गया था. दिल्ली के वाशिंदे घरों से निकल पड़े. साइकिलों, कारों, बसों, रिक्शों, तांगों, बैलगाड़ियों, यहां तक हाथियों-घोड़ों पर भी सवार होकर लोग दिल्ली के केंद्र यानी इंडिया गेट की ओर चल पड़े. लोग नाच-गा रहे थे, एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे और हर तरफ राष्ट्रगान की धुन सुनाई पड़ रही थी.'

उमेश चतुर्वेदी




