'हिन्दू साम्राज्य दिवस' छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के दिन को याद करने एवं उनके साहस, शौर्य, वीरतापूर्ण कार्य और एक आदर्श, सुशासनपूर्ण साम्राज्य स्थापित करने की प्रेरक यात्रा से प्रेरणा लेने के लिए मनाया जाता है।
'हिन्दू साम्राज्य दिवस' छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के दिन को याद करने एवं उनके साहस, शौर्य, वीरतापूर्ण कार्य और एक आदर्श, सुशासनपूर्ण साम्राज्य स्थापित करने की प्रेरक यात्रा से प्रेरणा लेने के लिए मनाया जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को उनका राज्याभिषेक हुआ था जो ग्रिगेरियन कैलेंडर के अनुसार 6 जून 1674 की तारीख थी। शिवाजी के साहसिक, अचंभित करने वाले कार्य और उनके सुशासनपूर्ण राज्य-व्यवस्था के प्रेरक प्रसंगों को उधृत किया जाता है जिससे वर्तमान समाज की चेतना जागृत हो सके।
शिवाजी महाराज के उस कालखंड के कार्य, प्रासंगिक विचार एवं आचरण का अनुसरण वर्तमान समाज एवं शासन व्यवस्था को करना चाहिए। उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व पूरे हिन्दू समाज एवं आनेवाली पीढ़ी के लिए आदर्श है और उसका अनुसरण किये बिना हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना करना असंभव सा प्रतीत होता है। अतः हमें इस दिन के महत्व को समझने की आवश्यकता है।
पूर्व पर्यावरण मंत्री (स्व) श्री अनिल माधव दवे द्वारा 2017 में एक संपादित पुस्तक 'शिवाजी और सूरज: नेतृत्व की कला' की प्रस्तावना में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने लिखा है, "17वीं शताब्दी में शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित राज्य और प्रशासन आज भी देश के लगभग सभी वर्गों के लिए प्रासंगिक, आदर्श और शोध का विषय बना हुआ है।" इसी पुस्तक की प्रस्तावना में वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लिखा, "...शिवाजी इस युग में भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं। आज जब देश सुशासन के लिए तरस रहा है तो यह याद करना प्रासंगिक होगा कि सदियों पहले इसी सुशासन के सिद्धांत के आधार पर शिवाजी के राज्य की नींव रखी गई थी।"
छत्रपति शिवाजी महाराज के समय की परिस्थिति और आज की परिस्थिति में बहुत अंशों में समानता है। उस समय जैसे चारों ओर से संकट थे, समाज अत्याचारों से ग्रस्त था, पीड़ित था, वैसे ही आज भी तरह-तरह के संकट हैं। आज सिर्फ विदेशी आक्रमण और उनकी सामरिक शक्तियों के ही संकट नहीं है बल्कि सामाजिक और अन्य सब प्रकार के संकट है। उस समय भी ये समस्याएं तो थी, लेकिन उन संकटों और समस्याओं के आगे समाज अपना आत्मविश्वास खो बैठा था। यह सब से बडा संकट था। मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से इन संकटों का सूत्रपात हुआ था। राजा, महाराजा राज्यों की सुरक्षा हेतु लड़ते रहे, लेकिन लडाई में बार बार मार खाते, कटते, पिटते भी रहे। विजय नगर के साम्राज्य का जब पतन हो गया तो समाज में एक निराशा सी व्याप्त हो गई। जैसी आज देखने को मिलती है। समाज का प्रबुद्ध वर्ग निराश था। कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती और निराशा का पहला परिणाम होता है आत्मविश्वास गवाँ बैठना। वह आत्मविश्वास उस समय की राज्य व्यवस्था और समाज से चला गया था। हिंदू स्वभावतः सहिष्णु और परोपकारी होते हैं अतः अत्याचार को स्वीकार कर पलायन कर जाते हैं। हिंदू द्वारा पराक्रम करने की इच्छा या सिंहासन पर बैठने की इच्छा करना यह बरबादी का लक्षण मन जाता था। इस प्रकार की मानसिकता हिंदु समाज की बनी थी। जब आत्मविश्वास शून्य हो जाता है तो फिर सब प्रकार के दोष आ जाते हैं। जैसे स्वार्थ, आपस में कलह और इसका लाभ लेकर विदेशी ताकतें बढती चली जाती हैं जिससे सामान्य लोगों का जीवन दुर्भर हो जाता है। अगर गंभीरता से हम विश्लेषण करें तो वर्तमान समाज भी इसी परिस्थिति से गुजर रहा है। उस समय शिवाजी महाराज के संघर्ष और पराक्रम से लंबे संघर्ष के बाद भारतीय इतिहास में पहली बार हिंदुओं का अधिकृत विधि-संमत, स्वतंत्र सिंहासन स्थापित हुआ।
शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक सिर्फ उनकी विजय नही अपितु अनेकानेक राजाओं और समाज के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा भारत माता के सम्मान में दी हुई आहुति का प्रतीक है। यह केवल शिवाजी महाराज की विजय नहीं है बल्कि संघर्ष करने वाले हिंदू राष्ट्र की अपने शत्रुओं पर विजय है। शिवाजी के सुशासन का संदेश उस दौर में स्पष्ट था। नया शासन, सत्ता और संपत्ति लूटता नहीं है, जो मनुष्य को ही बदल देने की चेष्टा करता है, और जो बदलने के लिये तैयार नहीं है उनका विनाश करता है। सहिष्णुता, शांति, अहिंसा और सब को अपना मानने वाला राज्य-व्यवस्था स्थापित करना। भारतीय समाज की पाँच सौ साल की ऐसी समस्या का निदान शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक से हो गया। इसी लिये उसका महत्व है। शिवाजी महाराज का पराक्रम, पौरुष और सुशासन देखने के बाद उस दौर में सबको भरोसा हो गया कि अगर इन संकटों का हल ढूँढकर, फिर से हिंदू समाज, हिंदू धर्म, संस्कृति, राष्ट्र को प्रगति पथ पर कोई अग्रसर कर सकता है तो वह शिवाजी महाराज हैं। उनसे प्रेरणा पाकर राजस्थान के सब राजपूत राजाओं ने अपने आपस के कलह छोडकर दुर्गादास राठोड के नेतृत्व में अपना दल बनाया और शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के पश्चात कुछ ही वर्षों में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न की कि सारे विदेशी आक्रामकों को राजस्थान छोडना पडा। राजा छत्रसाल ने तो प्रत्यक्ष शिवाजी महाराज से प्रेरणा पायी और स्वधर्म का एक साम्राज्य स्थापित किया। असम के राजा चक्रध्वजसिंह कहते थे कि जैसा शिवाजी कर रहे हैं वैसी नीति चलाकर इस असम पर किसी आक्रामक का पैर पडनें नहीं देंगें। असम कभी भी मुगलों का गुलाम नहीं बना। राजा चक्रध्वजसिंह ने कहा और लिखा कि शिवाजी जैसी नीति अपनाकर हम लोगों को मुगलों को खदेड देना चाहिये।कूच-बिहार के राजा रूद्रसिंह भी शिवाजी महाराज से प्रभावित थे।
शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक, संपूर्ण हिंदूराष्ट्र के लिये एक संदेश था कि यह विजय का रास्ता है। इस पर चलो। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का प्रयोजन ही यह था। शिवाजी महाराज के सारे उद्यम का प्रयोजन यही था। उनका उद्यम अपने लिये नहीं था। शिवाजी महाराज ने अपने व्यक्तिगत कीर्ति, सन्मान के लिये सत्ता संपादन नहीं किया। उनकी तो यह वृत्ति ही नहीं थी।"

डॉ. संजय वर्मा 




