राजा हर्षवर्धन के समय बसा था पालम गांव

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राजा हर्ष वर्धन ने इस गांव को 360 गांवों की चौधराहट का पुरस्कार दिया था। पालम गांव के निवासी प्रारंभ से ही प्रकृति के प्रेमी थे। प्राचीन काल से ही गांव में पचानवाली, रावली, रामजोहड़ी, गुलाजोहड़ और हरजोखड़ नाम से बड़े-बड़े तालाब थे जो गांव की पानी की जरूरत को पूरा करते और खेती के काम आते थे। मगर आज पालम गांव के अधिकांश प्राचीन तालाबों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। 

दिल्ली के सबसे प्राचीन गांवों में गिने जाने वाले पालम गांव का इतिहास राजा हर्षवर्धन के समय का है। राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में इस गांव के महाराजा किशन चंद सोलंकी को 360 गांवों का मुखिया नियुक्त किया गया था। राजा हर्षवर्धन के समय में राजस्थान के टोंक जिले से एक बड़े कबीले के लोगों को अकाल का सामना करना पड़ रहा था।

कबीले के लोगों ने अपने आध्यात्मिक संत दादा देव जी के आग्रह पर किसी दूसरे स्थान पर डेरा जमाना तय किया। सभी लोग महाराजा किशन चंद सोलंकी के नेतृत्व में नए ठिकाने की तलाश में निकल पड़े। गांव वाले बताते हैं कि महाराजा किशन चंद सोलंकी के कबीले के साथ उनके आध्यात्मिक गुरुदेव संत दादा देव भी आ रहे थे। संत दादा देव शाम के वक्त एक शिला पर बैठ कर भक्ति ध्यान किया करते थे। मगर यात्रा के दौरान ही संत दादा देव ने अपना शरीर त्याग दिया। कबीले के लोगों ने उनका अंतिम संस्कार करने के बाद उनकी पवित्र शिला को उठा कर बैलगाड़ी पर रखा और अपने साथ लेकर चलने पड़े।

एक रात कबीले के मुखिया को सपने में संत दादा देव ने दर्शन दिए और बोले कि यह शिला जहां गिर जाएगी तुम लोग वहीं अपना डेरा जमा लेना। कबीले के लोग यात्रा मार्ग में आगे बढ़ रहे कि एक रोज दादा देव के ध्यान करने वाली शिला एक स्थान पर गिर गई। कबीले के लोगो ने उस स्थान को पवित्र समझ कर वहीं पर डेरा जमा दिया। उस समय से पालम गांव का नाम पालम पाक आलम अर्थात पवित्र घर पड़ गया जिसे आज पालम गांव के नाम से पुकारा जाता है। पालम गांव में जहां संत दादा देव जी की शिला गिरी थी गांव वालों ने वहीं पर एक मंदिर की स्थापना कर पूजापाठ शुरू कर दिया। आज पालम गांव में सोलंकी गोत्र के चौधरियों का यह सबसे प्राचीन पवित्र मंदिर माना जाता है। हर साल दशहरा के समय संत दादा देव मंदिर पर गांव वालों की तरफ से भव्य मेले का आयोजन कराया जाता है। आज भी दूर-दूर से लोग इस मंदिर में पूजा करने आते हैं और संत दादा देव से आशीर्वाद प्राप्त करते है। गांव के किसी भी घर परिवार में होने वाले किसी भी शुभ कार्य से पहले लोग यहां आकर संत दादा देव की पूजा करते हैं। 

राजा हर्ष वर्धन ने इस गांव को 360 गांवों की चौधराहट का पुरस्कार दिया था। पालम गांव के निवासी प्रारंभ से ही प्रकृति के प्रेमी थे। प्राचीन काल से ही गांव में पचानवाली, रावली, रामजोहड़ी, गुलाजोहड़ और हरजोखड़ नाम से बड़े-बड़े तालाब थे जो गांव की पानी की जरूरत को पूरा करते और खेती के काम आते थे। मगर आज पालम गांव के अधिकांश प्राचीन तालाबों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। एक समय में इस गांव में पानी की भरमार थी मगर आज भूजल का स्तर लगातार कम होता जा रहा है।

पालम गांव में सोलंकी गोत्र के लोगों के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि जब दिल्ली में शाहजहां ने 1639 में लाल किले का निर्माण शुरू कराया तो पालम गांव के पांच सोलंकी हिंदूओं को बुलाकर लालकिले की नींव रखवाने का काम किया। पालम गांव के एतिहासिक दस्तावेजों में आज भी यह बात दर्ज है। दिल्ली के एतिहासिक पालम गांव की विशालता को इस बात से समझा जा सकता हैं कि इसी गांव से बागडौला, मोहम्मदपुर, मटियाला, शाहबाद, बिंदापुर, असालतपुर, डाबरी, नसीरपुर, गोयला खुर्द, नांगल राया और पूठकलां गाव निकले थे। एक समय में पालम गांव की जमीन दिल्ली के 52 गांवों तक फैली हुई थी।

 

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