महाभारत कालिन हैं महरौली का योगमाया मंदिर

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इस प्राचीन मंदिर के बारे में एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत के युध्द के समय जब कौरवों ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध कर दिया तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि वह  सूर्य ढलने से पूर्व जयद्रथ का वध कर देगा अन्यथा अपने प्राण त्याग देगा। अर्जुन की प्रतिज्ञा के बाद भगवान श्रीकृष्ण उन्हें लेकर योगमाया मंदिर आए और आदिशक्ति से सहायता मांगी। 

दिल्ली में महाभारत काल के जीवित मंदिरों में से एक योगमाया मंदिर महरौली अपनी आध्यात्मिक मान्यता के लिए प्रसिध्द है। इस मंदिर में दिनभर भक्तों का तांता लगा रहता है। योगमाया मंदिर भगवान श्रीकृष्ण की बहन को समर्पित मंदिर है। भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक इस योगमाया मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से की थी। मान्यता हैं कि जब पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नगर बसाया तब श्रीकृष्ण पांडवों के पास इंद्रप्रस्थ आएं थे। उन्होंने महरौली में आकर महालक्ष्मी योगमाया की पिंडी को स्थापित किया और पांडवों के साथ इस मंदिर में पूजा की थी। योगमाया की स्थापना के समय देवी से साक्षात रूप में दर्शन देकर पांडवों को विजयश्री का आशीर्वाद दिया था। योगमाया के आशीर्वाद के कारण ही अज्ञातवास में जाने पर पांडवों को दुर्योधन के गुप्तचर खोज नहीं पाएं थे। 10 वीं सदी में हिंदू हृदय सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इस स्थान पर महल का निर्माण कराने के लिए खुदाई आरंभ करवाई थी। उन्हें जब खुदाई में योगमाया मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए तो पृथ्वीराज ने महल का निर्माण बंद करवा कर भव्य योगमाया मंदिर का जीर्णाध्दार कराया था। इस मंदिर में एक अखंड ज्योति सदियों से जल रही है।

योगमाया मंदिर से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई है। मान्यता हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का माता देवकी ने जब कारागार में एक पुत्री को जन्म दिया तब मथुरा के राजा कंस ने देवकी के हाथ से उनकी पुत्री को छिन कर दीवार पर पटक दिया। मगर तभी देवी के रुप में जन्मी देवकी की पुत्री कंस के हाथ से छूट कर आकाश में लुप्त हो गई और उसने भविष्य वाणी कर दी कि कंस तुम्हारा वध करने वाले नारायण अवतार ले चुके हैं। पौराणिक मान्यताएं हैं कि कंस व्दारा दीवार पर पटकने से देवी योगमाया का मस्तक महरौली दिल्ली में गिरा एवं उनके चरण विंध्याचल में जाकर गिरे। आदिशक्ति योगमाया को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है। इसलिए महरौली के योगमाया मंदिर को आदिशक्ति की 51 शक्ति पीठों में गिना जाता है। आदिदेवी शक्ति का मस्तक इस स्थान पर एक पिंडी के तौर पर गिरा था जिसका ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण को था इसलिए जब वह इंद्रप्रस्थ आएं तो उन्होंने आदिशक्ति के पिंडी स्वरूप को स्वयं अपने हाथों से यहां स्थापित किया था।

इस प्राचीन मंदिर के बारे में एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत के युध्द के समय जब कौरवों ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध कर दिया तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि वह  सूर्य ढलने से पूर्व जयद्रथ का वध कर देगा अन्यथा अपने प्राण त्याग देगा। अर्जुन की प्रतिज्ञा के बाद भगवान श्रीकृष्ण उन्हें लेकर योगमाया मंदिर आए और आदिशक्ति से सहायता मांगी। जिसके बाद योगमाया ने कुछ समय के लिए सूर्य की किरणों को धरती पर आने से रोक दिया। संध्या का भ्रम होने पर जयद्रथ युध्द क्षेत्र में पहुंचा जिसके बाद सूर्य की किरणें पुनः प्रकट हो गई और अर्जुन ने उसे देखते ही उसका वध कर डाला।

ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं कि 16 वीं सदी में हिंदू राजा विक्रमादित्य ने महरौली आकर इस मंदिर का नवीनीकरण कराया था। समय के साथ ही इस मंदिर के आसपास अनेक जैन एवं हिंदू मंदिरों का निर्माण भी कराया गया। जैन शास्त्रों में इस क्षेत्र को योगिनीपुर कहा गया है। आक्रमणकारियों ने जब इस क्षेत्र में जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर कुतुबमीनार का निर्माण कराया तब इस प्राचीन मंदिर को तोड़ने का बार-बार प्रयास किया गया मगर आदिदेवी की शक्ति के समक्ष आक्रांताओं की सारी हिम्मत धरी की धरी रह गई। पांच हजार साल से भी अधिक पुराने इस प्राचीन मंदिर को भारत के अनेक हिंदू राजाओं ने समृध्द और सुंदर बनाने के लिए काम किया। नवरात्री के समय इस मंदिर की शोभा देखते ही बनती है यहा दिल्ली के कोने-कोने से लोग दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की मान्यता और योगमाया के आशीर्वाद की कथा सुनकर अकबर की पत्नी भी अपने पुत्र का जीवन मांगने के लिए मंदिर में दर्शन के लिए आई थी। जिसके बाद उनके पुत्र का जीवन बच पाया था।

 

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