पटपंड़गंज की लड़ाई: शाह आलम की गद्दारी से अंग्रेजों के हाथ में गई थी दिल्ली

नरेन्द्र कुमार वर्मा

क्या आप जानते हैं जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया तब दिल्ली पर मुगलों का नहीं मराठों का शासन था? जी हाँ यही सत्य हैं। सामान्यतः मुग़ल शासन फिर अंग्रेजी शासन चर्चा में आता हैं और मराठा शासन की कोई चर्चा ही नहीं होती हैं। जबकि दिल्ली में मराठों का लम्बे समय तक शासन रहा हैं और उस दौरान मुग़ल शासक मराठा शासन के अधीन रहे।

क्या आप जानते हैं जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया तब दिल्ली पर मुगलों का नहीं मराठों का शासन था? जी हाँ यही सत्य हैं। सामान्यतः मुग़ल शासन फिर अंग्रेजी शासन चर्चा में आता हैं और मराठा शासन की कोई चर्चा ही नहीं होती हैं। जबकि दिल्ली में मराठों का लम्बे समय तक शासन रहा हैं और उस दौरान मुग़ल शासक मराठा शासन के अधीन रहे। पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज में अंग्रेजों ने मराठा सेना को पराजित कर दिल्ली को अपने नियंत्रण में लिया था।

पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज से लेकर नोएडा के गोल्फ कोर्स तक क्षेत्र कभी युद्ध का विशाल मैदान हुआ करता था। दिल्ली का यह इलाका यमुना नदी के किनारे पर स्थित था। आज से 219 साल पहले इस मैदान में अंग्रेजों और मराठा सैनिकों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। अंग्रेज सेना मराठा सेना के मुकाबले बहुत अधिक संसाधन संपन्न थी। अंग्रेज सेना में घुड़सवारों की लंबी-चौड़ी टुकड़ी के साथ युद्ध में इस्तेमाल होने वाले नए हथियार बंदूके थी। जबकि मराठा सैनिक परंपरागत भालों तलवारों और दूसरे हथियारों से अंग्रेज सेना का मुकाबला कर रहे थे। 1803 में पटपड़गंज के इस मैदान में ईस्ट इंडिया कंपनी के जनरल गेरॉर्ड लेक अंग्रेज सेना का नेतृत्व कर रहे थे और फ्रांसिसी कमांडर लुई बॉरक्विएन मराठा सेना की कमान संभाले हुए थे। तीन दिनों तक दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें तीन हजार से ज्यादा मराठा सैनिक और 464 ब्रिटिश सैनिकों की भी मौत हो गई। इस विजय के बाद ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

इतिहास के पन्नों में यह घटना दर्ज हैं कि किस तरह ब्रिटिश सेना ने सिंधिया की सेना को पराजित कर दिल्ली पर अपना कब्जा जमाया। दरअसल मुगलों के पतन के बाद सिंधिया की मराठा सेना ने दिल्ली पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था। सिंधिया के पराक्रमी सेनापति महादजी शिंदे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ सेनानायक थे। कहा जाता हैं कि जिस सेना का वह नेतृत्व करते थे उसे हराना असंभव था। इतिहासकार मोहन शेटे लिखते हैं कि मराठा सरदार महादजी शिंदे ने अपनी सेना के साथ पूरी तरह से दिल्ली पर कब्जा करके लालकिले पर भगवा ध्वज लहरा दिया था। उस दौरान दिल्ली पर मराठों का शासन स्थापित हो गया था। जिन्होंने अपने पराक्रम से दिल्ली पर विजय पाई थी। इतिहासकार स्वप्ना लिडले अपनी किताब “चांदनी चौक द मुगल सिटी ऑफ ओल्ड देहली” में लिखती हैं कि मराठों ने 1760 में लाल किले के दिवाने-ए-खास की छत से चांदी निकलवाकर नौ लाख रुपये की कीमत के सिक्के बनवा लिए थे। इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में यह बात अंकित हैं कि 1771 से 1788 तक पराक्रमी और शक्तिशाली महादजी शिंदे के नेतृत्व में दिल्ली पर मराठों का कब्जा रहा और 15 वर्षों तक लालकिले पर भगवा झंडा लहरता रहा।

1802 में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय अंग्रेजों के रहमो-करम पर इलाहाबाद में जीवनयापन कर रहा था। शाह आलम ने अपना संदेश मराठाओं के पास भेजा जिसके बाद उसे गुपचुप तरीके से मराठा सेना उसे इलाहाबाद से दिल्ली ले आई। सिंधिया के सबसे विश्वासपात्र सेनापति महादजी शिंदे शाह आलम को इलाहाबाद से दिल्ली लेकर आए थे। पानीपत की लड़ाई में उनके एक पैर में भीषण आघात के कारण वह लंगड़े हो गए थे। दिल्ली की गद्दी पर दोबारा बैठने के बाद शाह आलम ने उन्हें वजीर-ए-मुतलक बना दिया। जब तक महादजी शिंदे जीवित रहे अंग्रेजों ने दिल्ली की तरफ नहीं देखा। मगर 12 फरवरी 1794 में पूना के पास उनकी मृत्यु होने के बाद अंग्रेज एकबार फिर दिल्ली पर वर्चस्व की राह खोजने लगे।

1803 में मुगल बादशाह शाह आलम ने एहसान फरामोशी दिखाते हुए अंग्रेजों के पास संदेश भेजा कि उन्हें मराठों के प्रभाव से मुक्त कराएं। ईस्ट इंडिया कंपनी तो इस मौके की तलाश में बैठी थी। कंपनी ने अपने जनरल लॉर्ड गेरॉर्ड लेक को बड़ी सेना के साथ दिल्ली भेज दिया। 11 सितंबर 1803 को दिल्ली में यमुना के मुहाने पर स्थित पटपड़गंज के विशाल मैदान में मराठा और अंग्रेज सेना के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया। “द एंग्लो मराठा कैम्पैनस एंड द कन्टेस्ट फॉर इंडियाः द स्ट्रगल” नामक पुस्तक में जी.एस.रैंडोल्फ कूपर लिखते हैं कि युद्ध का यह मैदान पूर्व में हिंडन और पश्चिम में यमुना नदी तक फैला हुआ था जो दोआबा की तरह था। दो नदियों के बीच के स्थान को भौगोलिक भाषाशैली में दोआबा कहा जाता हैं। उस समय यह दोआबा पटपड़गंज से लेकर नोएडा के गोल्फकोर्स तक फैला हुआ था। शाह आलाम की गद्दारी के कारण मराठा सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा और दिल्ली पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कब्जा जमा लिया।

मराठों के साथ विश्वासघात करने के बाद अंग्रेजों ने भी शाह आलम को एक किनारे बैठा दिया जिसके बाद उसकी हालत बेहद दयनीय होती चली गई। शासन के किसी भी काम में उसका कोई नियंत्रण नहीं था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर उसे कोई अहमियत नहीं देते थे। वह कमजोर और बुढ़ा होता जा रहा था धीरे-धीरे उसे दिखाई देना बंद हो गया और वह पूरी तरह से अंधा हो गया। जिसके बाद 19 नवंबर 1806 में उसकी मौत हो गई।

आरवी स्मिथ ने अपनी किताब “पटपड़गंज दैन एंड नॉउ” में भी पटपड़गंज की लड़ाई का विस्तार से उल्लेख किया हैं। दिल्ली का यह इलाका मुगल काल से ही चर्चा का केंद्र रहा था। पटपड़गंज का वास्तविक अर्थ होता हैं जमीन का वह निचला और समतल हिस्सा जिसमें खेती का काम नहीं होता। मुगलकाल में इस इलाके में जंगल हुआ करता था। इस लड़ाई में शहीद हुए अंग्रेज सैनिकों की स्मृति में ब्रिटिश सरकार ने 1916 में नोएडा के वर्तमान गोल्फकोर्स के पास एक स्तंभ लगाया जिस पर पटपड़गंज की इस लड़ाई का उल्लेख अंकित हैं। अंग्रेजी शासनकाल में ब्रिटिश सैनिकों के रिश्तेदार हर साल उन्हें याद करने के लिए इस स्तंभ पर आते रहते थे।

इंद्रप्रस्थ संवाद - नवीन अंक