शिक्षा वह है जो मनुष्य में उचित-अनुचित का विवेक जाग्रत करे – डॉ. मोहन भागवत जी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि परिस्थिति के सामने रोना नहीं, प्रयास करना, प्रतीक्षा करना, निरंतर संघर्ष करना। जीवन में परिस्थिति से भागना नहीं। भागने से, हट जाने से या बैठ जाने से अपकीर्ति मिलेगी, इसलिए डटे रहना, अड़े रहना। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धक्षेत्र से पलायन करने से रोका था।

नागपुर, 1 जुलाई 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज जरीपटका स्थित सिन्धु एजुकेशन सोसायटी के अमृत महोत्सव वर्ष के उद्घाटन कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा उपस्थित नागरिकों का मार्गदर्शन किया।

उन्होंने कहा कि 75 वर्ष पूर्ण होने का यह उत्सव केवल आनंद मनाने के लिए नहीं, बल्कि इस आनंद के पीछे जो संघर्ष की गाथा है, उसका स्मरण करने के लिए है। ऐतिहासिक प्रसंग सुना कर उन्होंने कहा कि परिस्थिति-दशा बदले, पर दिशा नहीं बदलनी चाहिए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन-प्रसंग का भी उल्लेख किया, एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में असफल होने के पश्चात निराश होकर ऋषिकेश गए थे, किंतु स्वामी शिवानंद के मार्गदर्शन से उन्हें प्रेरणा मिली कि एक दरवाजा बंद होने का अर्थ है कि दूसरा दरवाजा उनके लिए खुला है।

उन्होंने कहा कि परिस्थिति के सामने रोना नहीं, प्रयास करना, प्रतीक्षा करना, निरंतर संघर्ष करना। जीवन में परिस्थिति से भागना नहीं। भागने से, हट जाने से या बैठ जाने से अपकीर्ति मिलेगी, इसलिए डटे रहना, अड़े रहना। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धक्षेत्र से पलायन करने से रोका था।

विभाजन के समय अपना सब कुछ त्यागकर भारत आए सिंधी समाज के पूर्वजों का स्मरण करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि वे शरणार्थी नहीं, अपितु विस्थापित थे – जिन्होंने संपत्ति और करियर के स्थान पर अपना धर्म व राष्ट्र चुना। परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, धैर्य और सतत प्रयास से ही मनुष्य विजयी होता है।

उन्होंने कहा कि जीविकोपार्जन हेतु शिक्षा आवश्यक तो है, परंतु पर्याप्त नहीं। वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य में उचित-अनुचित का विवेक जाग्रत करे। यह शिक्षा घर से, माता से आरंभ होती है और जीवन भर के अनुभवों से पुष्ट होती है। उन्होंने भगवान बुद्ध की शिक्षा का स्मरण कराते हुए कहा कि जिस कर्म से दूसरों को कष्ट पहुंचे, वह पाप है और उससे सदैव बचना चाहिए।

मोहन भागवत जी ने कहा कि जीवन का लक्ष्य केवल स्वयं के लिए जीना नहीं, अपितु दूसरों के लिए जीना है – स्वयं अच्छा मनुष्य बनकर, आचरण के माध्यम से (शब्दों से नहीं) दूसरों को भी अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है। उन्होंने सिन्धु एजुकेशन सोसायटी की 75 वर्षों की यात्रा को इसी मूल्यनिष्ठ जीवन-दृष्टि का प्रतिबिंब बताते हुए संस्था को अमृत महोत्सव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम में संस्था के पदाधिकारी, शिक्षकगण, विद्यार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

 

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