“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक के डॉक्टर हेगेवार की प्रासंगिकता, अध्याय डॉक्टर हेडगेवार जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है। हेडगेवार जी से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 1913 में बंगाल की दामोदर नदी में भीषण बाढ़ आई तो भूखे प्यासे लोगों की मदद के लिए डॉक्टर साहब स्वयं पीठ पर मुरमुरे की बोरी लाद कर पीडित लोगों के बीच मदद के लिए पहुंचे थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक, भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच एवं भारतीय किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी जैसे महान विचार देश में विरलें ही जन्म लेते हैं। दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की राजनीतिक, सामाजिक, राष्ट्रवादी एवं आर्थिक सोच बहुत दूरगामी थी। दत्तोपंत जी द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों में जिन प्रभावशाली विचारों को व्यक्त किया गया उनका संकलन सुरुचि प्रकाशन की पुस्तक “दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” में किया गया है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक के संकलन का कार्य जानेमाने विचारक, पत्रकार एवं संपादक भानुप्रताप शुक्ल द्वारा किया गया है।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक की विषय वस्तु की अगर बात की जाए तो इसमें कुल 24 अध्यायों को शामिल किया गया है। इन अध्यायों में सूर्योदय के पूर्व, तिलकयुगीन नागपुर, तिकल युग का अंत,गांधी युग का आरंभ, तिलक एवं गांधी युग का नेतृत्व, परिवर्तित परिस्थितियां, अपरिवर्तित प्रेरणाएं, नित्यानित्य विवेक, डॉक्टर हेगेवार की प्रासंगिकता, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अपेक्षा, स्वयंपूर्ण कार्यपध्दति, मानदंड, आर्दश वीरव्रती, एक संपूर्ण राष्ट्र की संकल्पना, यथार्थ और भ्रांतियां, राष्ट्र का आत्मविश्वास, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार, हिंदू परंपरा का संदर्भ, शब्द और अर्थ, समरसता और समता, पिछड़े बंधु, विमुक्त जातियों की समस्या, व्याधि और उपचार, विकल्प, व्यावसायिक प्रतिनिधित्व और भारत में क्रांति शामिल हैं।
वीडियो पुस्तक समीक्षा: दत्तोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक के डॉक्टर हेगेवार की प्रासंगिकता, अध्याय डॉक्टर हेडगेवार जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है। हेडगेवार जी से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 1913 में बंगाल की दामोदर नदी में भीषण बाढ़ आई तो भूखे प्यासे लोगों की मदद के लिए डॉक्टर साहब स्वयं पीठ पर मुरमुरे की बोरी लाद कर पीडित लोगों के बीच मदद के लिए पहुंचे थे। पुस्तक में डॉक्टर साहब के सनातन हिंदू धर्म एवं संस्कृति के विकास के लिए किए गए भावनात्मक कार्यों का भी उल्लेख किया गया है।
पुस्तक के अध्याय मानदंड में भारतीय सनातन संस्कृति के प्रति पश्चिम देशों की आस्था और समर्पण का उल्लेख करते हुए कई महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख किया गया है। संभवतः आज के संदर्भ में युवाओं को इन प्रसंगों से बहुत प्रेरणा मिल सकती है। मानदंड अध्याय में ठेंगड़ी जी लिखते है कि जब रूस के तानाशाह स्टालिन की बेटी श्वेतलाना भारत आई तो संवाददाताओं ने उनसे पूछा आप इतने शक्तिशाली देश से भारत क्यों आईं हैं इस प्रश्न का उत्तर देते हुए श्वेतलाना ने कहा मेरी अब एक ही इच्छा है कि मैं पवित्र गंगा नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर अपने जीवन के अंतिम समय को बिताऊं। इसी तरह एक अन्य प्रसंग में दत्तोपंत ठेंगड़ी जी लिखते है कि अमेरिका के प्रसिध्द उद्योगपति हेनरी फोर्ड के नाती जब भारत आए तो संवाददाताओं ने उनसे पूछा कि आप हरे-राम-हरे कृष्ण आंदोलन के चक्कर में कैसे पड़ गए आपके पास तो अकूत धनसंपत्ति है। इस पर वह बोले मुझे इसी से शांति मिलती है और रही बात संपत्ति की तो वह मात्र संपत्ति है वह भी भगवान कष्ण की है। इसी तरह के अनेक प्रेरणादायक प्रसंग इस अध्याय में है।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक एक तरह से ज्ञान का विशाल भंडार है जिसके अध्ययन से नई-नई जानकारियां मिलती हैं। पुस्तक के अध्याय यथार्थ और भ्रांतियां में एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए ठेंगड़ी जी लिखते हैं कि संघ के स्वयं स्वकों के लाठी एवं खड़ग धारण करने के प्रश्न पर किस तरह से डॉक्टर गोलवलकर जिन्हें स्नेह से लोग श्रीगुरुजी कहते थे इस प्रश्न का बड़ा सटिक उत्तर दिया। पुस्तक में लिखा है 1946 श्रीगुरुजी कलकत्ता में मेडिकल कॉलेज के प्राध्यापकों के बीच पहुंचे थे। चायपान के दौरान एक प्राध्यापक ने श्रीगुरुजी से पूछा कबड्डी, दंड और खडग से कैसे राष्ट्र निर्माण हो सकता है। इस पर श्रीगुरुजी ने उनसे पूछा कि पेनिसिलिन औषधि का निर्माण कैसे किया जाता है। उत्तर मिलने पर श्रीगुरुजी ने कहा यदि बासी खाने पर जमा हुई फफूंदी से औषधियों का राजा पेनसिलिन का निर्माण हो सकता है तो इसका अर्थ है कि विशेषज्ञ के हाथों में क्षुद्र से क्षुद्र वस्तु से भी उत्तम परिणाम की प्राप्ती हो सकती है। इसी दृष्टि से हम भी संगठन शास्त्र के विशेषज्ञ हैं।
पुस्तक के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार में लिखा गया हैं कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा कोई नई बात नहीं है। यह सनातन सत्य है। एक अंग्रेजी कविता का उल्लेख करते हुए ठेंगड़ी जी लिखते है Men may come and men may go But I go on for ever. अर्थात मनुष्य आते हैं और चले जाते हैं किंतु मैं सदा-सर्वदा चलता ही रहता हूं। इसी प्रकार हमारा कहना है कि शासन आएंगे, और नष्ट हो जाएंगे किंतु यह हिंदू राष्ट्र, यह हिंदू समाज सनातन काल से चलता आया है और चिरकाल तक चलता रहेगा।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक ठेंगड़ी जी के विचार, दर्शन, इतिहास, आध्यात्म, शब्द संयोजन, अध्ययन शीलता एवं मानवता एवं मातृभूमि के प्रति उनके समपर्ण को दर्शाती है। दंतोपंत ठेंगड़ी जी एक महान विचारक ही नहीं थे बल्कि उन्होंने अपने विचारों को जीवनभर निभाया और उन्हीं के अनुसार काम किया।
पुस्तक के शब्द और अर्थ अध्याय में लिखा गया है कि पाकिस्तान का निर्माण इस्लाम के नाम पर हुआ। वह एक राज्य तो बन गया लेकिन राष्ट्र नहीं बन सका। अगर आज के संदर्भ में इस विचार को देंखे तो यह नितांत सत्य प्रतित होता है। 1947 के बाद पाकिस्तान में अहमदिया, शिया और मुजाहिद मुसलमानों को क्यों नहीं अपनाया गया पुस्तक में इस पर भी सवाल खड़ा किया है।
दंतोपंत ठेंगड़ी जी को संविधान निर्माता बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर जी के साथ कई बार चर्चा का अवसर मिला। इस पुस्तक में बाबा साहब के व्यक्तित्व, उनकी सरलता, उनके ज्ञान, उनके विचारों, उनके सिध्दांतों और उनकी राष्ट्रीय सोच के बारे में समरसता और समता अध्याय में विस्तार के साथ उल्लेख किया गया है। अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं करने वाले बाबा साहब के बारे में एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए ठेंगड़ी जी लिखते हैं कि भंड़ारा लोकसभा के उपचुनाव की एक बैठक में बाबा साहब के तमाम कार्यकर्ताओं के साथ मैं भी स्वयं उपस्थित था। सभी कार्यकर्ताओं का विचार था कि चुनाव में वह केवल एक ही वोट का इस्तेमाल करेंगे। अर्थात केवल बाबा साहब को ही वोट देंगे दूसरा वोट किसी भी उम्मीदवार को नहीं देंगे उसे व्यर्थ कर देंगे। इसी बीच बैठक में बाबा साहब भी उपस्थित हुए उन्होंने जब कार्यकर्ताओं की राय सुनी तो गंभीर होकर बोले मैंने भारत का संविधान बनाया है इसलिए मैं अपने अनुयायियों से कभी भी संविधान के विरुध्द व्यवहार करने को नहीं कह सकता। मैं चुनाव हार जाना बेहतर समझूंगा। ठेंगड़ी जी लिखते हैं कि चुनाव जीतने का सरल नुस्खा उपलब्ध होने पर भी बाबा साहब ने उसे नहीं अपनाया और वह चुनाव हार गए। इसी तरह समरसता और समता अध्याय में बाबा साहब से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख किया गया है।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक के अंतिम अध्याय भारत में क्रांति में ठेंगड़ी जी ने दुनिया के अनेक क्रांतिकारी नेताओं और उनकी नीतियों और विचारों के बारे में लिखा है। शिवाजी महाराज एवं तात्या टोपे की गुरिल्ला युध्द शैली का भी उन्होंने उल्लेख किया है। ठेंगड़ी जी लिखते है कि बरेली और लखनऊ हाथ से निकल जाने के बाद तात्या टोपे ने अगर गंगा के विस्तृत मैदानों में गुरिल्ला शैली अपनाई होती तो उन्हें निराशा नहीं मिलती। इस अध्याय में उन्होंने दुनिया के अनेक गुरिल्ला नेताओं की शैली के बारे में लिखा है। निश्चित रुप से इस पुस्तक के अध्यय से पता चलता है कि दंतोपंत ठेंगड़ी जी दृढ़ निश्चियी और ध्येय को लेकर चलने वाले मनीषी थे।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” पुस्तक के संकलनकर्ता भानुप्रताप शुक्ल ठेंगड़ी जी के श्रेष्ठ विचारों को संकलित कर एक दृष्टिपरक पुस्तक तैयार की है। ठेंगड़ी जी प्रेरणादायक विचार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं का मार्ग दर्शन करने का काम करते रहेंगे।
“दंतोपंत ठेंगड़ी संकेत रेखा” इस पुस्तक के अध्ययन के बाद दंतोपंत ठेंगड़ी जी के विचार एवं उनके चिंतन से जुड़े अनेक प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है। विभिन्न कार्यक्रमों में भिन्न-भिन्न समय पर प्रकट किए गए उनके विचार वर्तमान परिस्थितियों में भी बेहद उपयोगी और ज्ञानवर्ध्दक है।
इस पुस्तक का मूल्य 160 रुपये है। आप एक बार यह पुस्तक अवश्य पढ़े। इस इस पुस्तक को खरीदने या और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए आप Email - sahityadarpanbharat@gmail.com पर संपर्क कर सकते है

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