नवसंवत्सर का ऐतिहासिक महत्व है। इस दिन के सूर्योदय से भगवान ब्रम्हा जी ने सृष्टि की रचना की थी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनि, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों का पूजन किया जाता है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया और उन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत का नाम पड़ा। इस वर्ष विक्रमी संवत 2080 प्रारंभ होगा।
नववर्ष उल्लास, उमंग और उत्सव का परिचायक है। नई सोच, नए कार्यक्रम और सब कुछ नया-नया करने की आकांक्षा। वैश्वीकरण की नई सोच और संस्कृति ने हमारी सनातनी परंपरा और नव वर्ष की परिभाषा ही बदल दी है। वर्तमान युवा पीढ़ी नव वर्ष को ग्रिगेरियन कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी को ही नववर्ष जानती और मनाती है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने भारतीय नववर्ष के महत्व को ही खत्म कर दिया एवं हिन्दू नववर्ष या नवसंवत्सर को रूढ़िवादी और अविकसित समाज की सोच के रूप में परिभाषित किया। विश्व में विभिन्न स्थानों में और विभिन्न सम्प्रदायों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों में मनाया जाता है और विभिन्न संस्कृतियों में इसके महत्व में भी परस्पर भिन्नता है। ठीक इसी तरह भारत के अलग-अलग प्रान्तों और समुदायों के नववर्ष की तिथियों में भिन्नता है। उत्तर भारत के हिन्दू सम्प्रदाय में नववर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि बुधवार, 22 मार्च 2023 के दिन है। हिन्दू सनातन धर्म में यह दिन सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन को ही हिन्दू नववर्ष या नवसंवत्सर भी कहते हैं।
नवसंवत्सर का ऐतिहासिक महत्व है। इस दिन के सूर्योदय से भगवान ब्रम्हा जी ने सृष्टि की रचना की थी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनि, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों का पूजन किया जाता है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया और उन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत का नाम पड़ा। इस वर्ष विक्रमी संवत 2080 प्रारंभ होगा। श्री राम और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक का यही दिन है। शक्ति की उपासना अर्थात नवरात्र का पहला दिन यही होता है। विक्रमादित्य की भांति ही शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में इसी दिन अपना राज्य स्थापित किया और विक्रमी संवत की स्थापना की।
भारत में अलग-अलग राज्यों में नव वर्ष की तिथियों और नामों में भिन्नता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी-पड़वा के नाम से, पंजाब में बैशाखी जो 13 अप्रैल को मनाते हैं। सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 14 मार्च को होला मोहल्ला नया वर्ष होता है। गोवा में कोंकणी नाम से, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में उगादि नाम से, कश्मीरी पंडित इसे नवरोह, बंगाल में नबा बरसा, असम में बिहू, केरल में विशु, तमिलनाडु में पुतुहांड नाम से मनाते हैं। इसी प्रकार अन्य प्रदेशों में भी अलग-अलग नाम और तिथि को नव वर्ष मनाया जाता है। नवसंवत्सर फाल्गुन मास के बाद आता है। पूरे भारत, खासकर उत्तर भारत में फाल्गुन मास होली के गीतों, प्यार-मोहब्बत के रंगों और उमंगों से रंगा होता जो सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। इन्ही रंगों और उमंगों से नवसंवत्सर का उल्लास और बढ़ जाता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है जिन्हें भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में हम जानते हैं।
आज आवश्यकता है कि हम वर्तमान पीढ़ी को भारतीय सनातन संस्कृति से परिचित कराकर गौरव की अनुभूति कराएं जो पश्चिम की उपभोक्ताओंवादी संस्कृति का आलिंगन किये हुए है।
- लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है।

डॉ. संजय वर्मा 




