संस्कृत को राजभाषा बनाना चाहते थे डॉ. अंबेडकर

उमेश चतुर्वेदी

अंबेडकर को लगता था कि हो सकता है तमिल उत्तर भारत में स्वीकार्य न हो। उसी तरह हिंदी दक्षिण भारत में स्वीकार्य न हो, लेकिन संस्कृत को लेकर उत्तर और दक्षिण में विरोध की कोई आशंका नहीं थी। शायद यही वजह है कि अंबेडकर ने संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था। 

देश को स्वाधीनता मिले दो साल बीत चुके थे। आजाद भारत को नया विधान देने के लिए संविधान सभा लगातार कार्य कर रही थी। भारत की राजभाषा क्या हो, इसे लेकर प्रस्ताव आने वाला था। संविधान सभा में भाषा का सवाल उठने के ठीक एक दिन पहले 11 सितंबर 1949 को 'नेशनल हेराल्ड' अखबार में एक खबर छपी, 'संस्कृत के साथ अंबेडकर।'

उन दिनों इस समाचार ने देश को चौंका दिया था। अंग्रेजी पढ़े-लिखे और ब्रिटिश वायसराय की कौंसिल यानी मंत्रिमंडल के सदस्य रह चुके डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को लेकर कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि वे संस्कृत का समर्थन करेंगे। लेकिन नेशनल हेराल्ड में छपी इस खबर ने डॉ. अंबेडकर को लेकर जारी धारणा को खंडित कर दिया था। उस समाचार के अनुसार संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष और देश के तत्कालीन विधि मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर उस धारा के साथ थे, जो संस्कृत को स्वाधीन भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा बनाने की पैरोकार थी। संस्कृत को भारतीय संविधान की आधिकारिक राजभाषा बनाने वाले प्रस्ताव में अंबेडकर के साथ भारत के विदेश मामलों के उप मंत्री डॉ. बी.वी. केसकर और बंगाल से चुन कर आए संविधान सभा के सदस्य नजीरुद्दीन अहमद थे। यही केसकर बाद में भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री भी बने और उनके ही कार्यकाल में आकाशवाणी ने इतना विकास किया कि आकाशवाणी के इतिहास में उस युग को स्वर्णकाल कहा जाता है।

डॉ. अंबेडकर ने यह प्रस्ताव राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद्  के उस प्रस्ताव के संशोधन के रूप में दिया था, जिसमें परिषद ने कहा था कि अंग्रेजी की जगह हिंदी को निश्चित रूप से प्रतिष्ठित किया जाए। उसे अंग्रेजी की जगह लेने के लिए दस साल से ज्यादा का वक्त भी नहीं लगना चाहिए। परिषद ने इसी प्रस्ताव में सुझाव दिया था कि भारतीय संघ के सभी प्रान्त अपनी-अपनी स्थानीय एवं प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हों। लेकिन उनकी शिक्षा व्यवस्था में दो भारतीय भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य होगी। तत्कालीन सरकार को भेजे इसी प्रस्ताव में राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद् ने यह भी सुझाव दिया था कि आदर्श वाक्यों, उपाधियों आदि तथा शोभनीय-प्रसिद्ध जगहों के लिए भारतीय संघ को संस्कृत का प्रयोग करना। राष्ट्रभाषा ने अपना यह त्रिसूत्रीय प्रस्ताव अगस्त, 1949 में सरकार को दिया था। डॉ. अंबेडकर ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद के इसी प्रस्ताव में संशोधन के रूप में सुझाया था। डॉ. अंबेडकर ने यह सुझाव तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया था।

डॉ. अंबेडकर ने जो प्रस्ताव जवाहर लाल नेहरू सरकार को सौंपा था, उसमें भी तीन बिंदु थे। इसके अनुसार, भारतीय संघ की भाषा संस्कृत को बनाना था, जबकि दूसरा प्रस्ताव यह था कि स्वाधीनता  के शुरूआती 15 सालों तक अंग्रेजी का ही आधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग हो, लेकिन उसके समानांतर संस्कृत का भी प्रयोग होना चाहिए। तीसरा प्रस्ताव यह था कि 15 साल की इस अवधि के बाद संस्कृत को संघ की आधिकारिक भाषा बनाया जाए। इसके साथ ही अंबेडकर ने सुझाव दिया था कि संविधान सभा को यह कानून भी बनाना चाहिए कि अंग्रेजी सिर्फ 15 साल तक ही काम में ली जाएगी।

संविधान सभा में जब भाषा को लेकर 12 सितंबर 1949 को बहस शुरू हुई तो संस्कृत को राजभाषा बनाने के पक्ष में 28 सदस्यों ने संशोधन पेश किये थे। इन प्रस्तावकों में प्रमुख थे एल. के मैत्र, टी टी कृष्णामाचारी और श्यामाप्रसाद मुख़र्जी। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर और नजीरुद्दीन अहमद भी इनके साथ थे। नजीरूद्दीन अहमद ने संस्कृत के समर्थन में भाषण भी दिया था, हालांकि डॉ. अम्बेडकर ने सिर्फ संशोधन प्रस्ताव ही पेश किया था, भाषण नहीं दिया था।

दरअसल डॉ. अंबेडकर बेहद अध्यवसायी थे। अपने व्यापक अध्ययन के आधार पर आर्यों के बाहर से आने की प्रचलित अवधारणा से सहमत नहीं थे। वे मानते थे कि आर्य भारत से नहीं आए, बल्कि द्रविड़ लोगों के साथ वे भी यहीं के मूल वंशज हैं। भारत में आर्यों के बाहर से आने की इतिहासकारों की कल्पना को सबसे पहले आर्यसमाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने खारिज किया था। स्वामी विवेकानंद का भी यही मानना था। अंबेडकर ने सिर्फ अंग्रेजी या मराठी ही नहीं, बल्कि संस्कृत ग्रंथों का बहुत अध्ययन किया था। इसीलिए वे मानते थे कि आर्य और द्रविड़ की यह अवधारणा स्वाधीन भारत में टूटनी चाहिए। यही वजह रही कि वे संस्कृत के अध्ययन के पैरोकार बने। उनका मानना था कि संस्कृत के अध्ययन के चलते लोगों की धारणा बदलेगी, सोच भी बदलेगी और भारत को लेकर जारी ऐतिहासिक भ्रांतियां भी टूटेंगी। भारत की भ्रांतियों को तोड़ने की रोशनी उन्हें संस्कृत में ही नजर आती थी।

यह भी कम लोगों को पता है कि डॉ. अंबेडकर संस्कृत की मुख्यधारा में पढ़ाई कराए जाने के भी समर्थक थे। पारंपरिक संस्कृत शिक्षण व्यवस्था को आधुनिक दृष्टि देने और उसे समकालीन माहौल में पढ़ाए जाने का सुझाव भी अंबेडकर ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया था। इसी के परिणाम स्वरूप 1956 में भारत सरकार ने संस्कृत शिक्षण आयोग बनाया था।  इस आयोग के अध्यक्ष जाने-माने भाषाविज्ञानी डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी बनाए गए, जबकि डॉ. वी. राघवन, आर.एन. दाण्डेकर और विश्वबन्धु शास्त्री जैसे जाने-माने विद्वानों को इस आयोग का सदस्य बनाया गया था।

डॉ. अंबेडकर की जीवनियों से गुजरते हैं तो पता चलता है कि अपनी पढ़ाई के दिनों में वे संस्कृत का विधिवत अध्ययन करना चाहते थे। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों की वजह से ऐसा संभव नहीं हो पाया। लेकिन जब वे जर्मनी की बोन यूनिवर्सिटी में पढ़ने पहुंचे तो उन्होंने वहां संस्कृत का विधिवत अध्ययन किया।

डॉक्टर अंबेडकर की 130वीं जयंती पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शरद बोबडे ने भी अंबेडकर के इस संस्कृत प्रेम का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था कि डॉ अंबेडकर ने भारत की भावी भाषा समस्या को समझ लिया था। इसीलिए उन्होंने भारत की आधिकारिक भाषा संस्कृत को बनाने का प्रस्ताव रखा था। दरअसल अंबेडकर को लगता था कि हो सकता है तमिल उत्तर भारत में स्वीकार्य न हो। उसी तरह हिंदी दक्षिण भारत में स्वीकार्य न हो, लेकिन संस्कृत को लेकर उत्तर और दक्षिण में विरोध की कोई आशंका नहीं थी। शायद यही वजह है कि अंबेडकर ने संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था। अंबेडकर भारत की भाषायी समस्या को दूर करना चाहते थे और इस राह में उन्हें संस्कृत ही सबसे सहज और उपयोगी भाषा नजर आ रही थी। उसका साहित्य और उसमें स्थित ज्ञान का भंडार भी उन्हें आकर्षित करता था। लेकिन अंबेडकर का यह सपना पूरा नहीं हो पाया।

 

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