राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 18 वर्ष लगातार विचार वह तपश्चर्या के पश्चात एक रूपरेखा निश्चित कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। हिंदू राष्ट्र का वैभव शिखर पर पहुंचे इस महान कार्य हेतु पांच स्वयंसेवकों के साथ संघ की स्थापना हुई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 18 वर्ष लगातार विचार वह तपश्चर्या के पश्चात एक रूपरेखा निश्चित कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। हिंदू राष्ट्र का वैभव शिखर पर पहुंचे इस महान कार्य हेतु पांच स्वयंसेवकों के साथ संघ की स्थापना हुई।
गोदावरी, हरिद्रा तथा मंजीरा नदी के संगम पर बसे कन्दकुर्ती गांव में हेडगेवार परिवार रहता था। बाद में उनका परिवार नागपुर आ गया। इसी परिवार में बलिरामपंत हेगड़ेवार एक परोपकारी व्यक्ति थे। आपकी पत्नी का नाम रेवती सुशीला था। ईश्वर की कृपा से वर्ष प्रतिपदा गुड़ी पड़वा, हिन्दू नववर्ष के दिन अंग्रेजी तारीख अनुसार 1 अप्रैल 1889 को पांचवीं संतान के रूप में केशव का जन्म हुआ। वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे।
22 जून 1897 को महारानी विक्टोरिया के राज को साठ वर्ष पूरा होने पर अंग्रेज समारोह मना रहे थे। केशव के विद्यालय में भी मिठाई बाटी गई। सभी छात्र महारानी विक्टोरिया की स्तुति गा रहे थे। केशव से यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने मिठाई को कूड़ेदान में फेंकते हुए कहा “अंग्रेज हमारे दुश्मन है, मिठाई खिलाकर हमें गुलामी की जंजीरों में और अधिक कसना चाहते हैं।“ केशव के एक इशारे पर छात्रों ने मिठाई फेंक दी।
एक और घटना तब की है जब एडवर्ड (सप्तम) भारत आए। नागपुर में भी हजारों की संख्या में लोग उसे देखने गए। तब केशव ने कहा यह हमारे दुश्मनों का राजा है, उसके राजा बनने की खुशी हमें क्यों हो?
जब केशव 13 वर्ष के थे तब नागपुर में प्लेग की बीमारी फ़ैल जाने से आपके माता पिता का देहांत हो गया।
जब केशव नागपुर के सिटी हाई स्कूल में पढ़ते थे एक दिन वहां विद्यालय निरीक्षक आने वाले थे। केशव के नेतृत्व में निरीक्षक के आने पर हर कक्षा में ‘वंदे मातरम’ गूंज उठा। अधिकारी क्रोधित हो गए हेडमास्टर से पूछा कि यह कौन करवा रहा है सब को कड़ी सजा दो। हेडमास्टर ने सभी छात्रों से पूछा किसी ने भी केशव का नाम नहीं बताया। पर बात पता चल गई केशव पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया पर उन्होंने कहा कि “जो शासन अपनी मां को प्रणाम नहीं करने देता वह अन्यायी है। उसे उखाड़ फेंकना चाहिए।“ केशव को विद्यालय से निकाल दिया गया।
केशव के इन कार्यों को देखकर लोगों ने कहा कि पहले पढ़ लो फिर देशभक्ति करना। केशव ने कहा की “मैं पढूंगा कहां? अंग्रेजों द्वारा चलाए जा रहे विद्यालयों में? वे तो गुलामी के कारखाने हैं वहां पढ़ना पाप है।“
नागपुर, यवतमाल और पुणे से प्राथमिक शिक्षा के बाद 1910 में उन्होंने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। केशव बलिराम बंगाल के क्रांतिकारियों से प्रभावित थे। कोलकाता में वह क्रांतिकारियों से गुप्त तौर तरीके सीखे। वह प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे बिपिन चंद्र पाल, श्यामसुंदर चक्रवर्ती इत्यादि के घर आने-जाने लगे। केशव ने प्रतिज्ञा लेकर क्रांतिकारी दल में अनुशीलन समिति की सदस्यता ली।
केशव बलिराम डॉक्टर बने। कॉलेज के प्राचार्य केशव को एक बड़े अस्पताल में नौकरी दिलाना चाहते थे। लेकिन केशव ने कहा कि “देश की परिस्थिति सुधारने के लिए मेरे जैसे हजारों युवकों को अपना सब कुछ न्योछावर करना होगा।“ वह नागपुर वापस आ गए।
चाचा द्वारा विवाह के लिए दबाव डालने पर कहा कि “मेरे जीवन में निजी सुख व निजी परिवार के लिए कोई जगह नहीं है। देश सेवा के लिए ना जाने कितनी बार जेल जाना होगा।“ डॉक्टर साहब ने संकल्प नाम से हिंदी सप्ताहिक पत्र और स्वातंत्रय नाम से मराठी दैनिक भी निकाला।
1916 में आप कांग्रेस जन आंदोलन से जुड़े। वर्ष 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में भोजन व्यवस्था का कार्य आप को दिया गया। उस समय आपने हर प्रांत के राष्ट्रभक्त से बात किया। 1921 में असहयोग आंदोलन के समय आप अंग्रेजों के खिलाफ खुलेआम भाषण देने लगे। आपके भाषण पर पाबंदी लगाकर आपको कारागार में डाल दिया गया। 12 जुलाई 1922 को कारागार से छूटने के बाद कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श कर 5 नवयुवकों को लेकर वर्ष 1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर शहर में आपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। नागपुर में ही सलुबाई मोहिते के बाड़ा में संघ की शाखा लगी। डॉ हेडगेवार यात्रा व प्रवास से लोगों को जोड़ने लगे। शाखा में कहा जाता था अपनी मातृभूमि से प्रेम करो, जात पात का भेद ना लाते हुए भारत जननी के पुत्रों से प्रेम करो, स्वालंबी वीर बनो, हिंदुओं को संगठित करो।
1930 में अंग्रेजों के विरुद्ध कानून तोड़ने का मुकदमा चला। 22 जुलाई 1930 को यवतमाल में आपने जंगल सत्याग्रह किया जिसके लिए उन्हें 9 माह की कैद हुई। लंबे समय तक कार्य करते रहने से आप बीमार रहने लगे। नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग लगा आप स्वयंसेवकों से मिलने के लिए बेचैन थे। डॉक्टर ने आज्ञा दे दी। 9 जून को अपने स्वयंसेवकों से मिलकर संघ के बारे में बात की उस समय आप बुखार से तप रहे थे। सेहत गिरती चली गई। अंत में संघ का कार्य माधव सदाशिव राव गोलवलकर ‘श्री गुरुजी’ को सौंप दिया तथा 21 जून 1940 को अंनत यात्रा पर प्रस्थान कर गए।

सीमा ओझा




