हमारी विशिष्ट आर्थिक दृष्टि हमारे राष्ट्र के प्रदीर्घ जीवनानुभव तथा देशविदेश मे सम्पन्न किए गए आर्थिक पुरुषार्थ से बनी है । उसमें सुख का उद्गम मनुष्य के अंदर माना गया है ।
(विजयादशमी उत्सव (शुक्रवार दि.15 अक्तूबर 2021) के अवसर पर प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत के उद्बोधन का अंश)
प्रचलित अर्थचिंतन आज नई समस्याओं का सामना कर रहा है, जिन का समाधानकारक उत्तर अन्य देशों के पास नहीं है । यांत्रिकीकरणसे बढती बेरोजगारी, नीतिरहित तकनीकी के कारण घटती मानवीयता व उत्तरदायित्व के बिना प्राप्त सामर्थ्य यह उनके कुछ उदाहरण हैं । भारत से अर्थव्यवस्था के तथा विकास के नए मानक की अपेक्षा व प्रतीक्षा संपूर्ण विश्व को है । हमारी विशिष्ट आर्थिक दृष्टि हमारे राष्ट्र के प्रदीर्घ जीवनानुभव तथा देशविदेश मे सम्पन्न किए गए आर्थिक पुरुषार्थ से बनी है । उसमें सुख का उद्गम मनुष्य के अंदर माना गया है । सुख वस्तुओं में नहीं होता है । सुख केवल शरीर का भी नहीं होता है । शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा चारों को एक साथ सुख देने वाली; मनुष्य, सृष्टि, समष्टि का एक साथ विकास करते हुए उसको परमेष्ठी की ओर बढ़ाने वाली; अर्थ-काम को धर्म के अनुशासन में चलाकर मनुष्य मात्र की सच्ची स्वतंत्रता को बढ़ावा देने वाली अर्थव्यवस्था हमारे यहाँ अच्छी मानी गई है । हमारे आर्थिक दृष्टि में उपभोग नहीं संयम का महत्व है । भौतिक साधन संपत्ति का मनुष्य विश्वस्त है, स्वामी नहीं । सृष्टि का वह अंग है, स्वयं की आजीविका के लिये सृष्टि का दोहन करनेके साथ ही उसका संरक्षण संवर्धन भी उसका कर्तव्य है ऐसी हमारी मान्यता है । वह दृष्टि एकांतिक नहीं है । केवल पूंजीपति अथवा व्यापारी अथवा उत्पादक अथवा श्रमिक के एकतरफा हित की नहीं है । इन सब को ग्राहकसहित एक परिवार जैसा देखते हुए सब के सुखों की, संतुलित, परस्पर संबंधों पर आधारित वह दृष्टि है । उस दृष्टि के आधार पर विचार करते हुए, विश्व के आज तक के अनुभव से जो नया सीखा है, अच्छा सीखा है तथा आज की हमारी देश काल परिस्थिति से सुसंगत है, उसको साथ जोडते हुये ऐसी एक नई आर्थिक रचना को हम अपने देश में खड़ी करके दिखाएँ, यह समय की आवश्यकता है । समग्र व एकात्म विकास के नये धारणाक्षम प्रतिमानका प्रकटीकरण होना स्वाधीनता का स्वाभाविक परिणाम है, "स्व" की दृष्टि का चिरप्रतीक्षित आविष्कार है।

IVSK




