सेकुलरिज्म के नाम पर हमारे त्योहार जैसे करवाचौथ को नारी उत्पीड़न कहना, दशहरा एवं गणेशचतुर्थी पर मूर्ति स्थापना को फिजूलखर्ची, नवरात्रि पर आयोजित होने वाले गरवा और अन्य आयोजन को महिलाओं से छेड़छाड़ का माध्यम बताना। पिछले कुछ वर्षों से अर्बन नक्सली और छद्म सेक्युलर वकीलों ने न्यायपालिका के माध्यम से दीपावली को ध्वनि प्रदूषण का माध्यम बताकर पटाखों पर रोक लगवाने में सफल हुए हैं और इसे फिजूलखर्ची बता रहे हैं।
भारतीय सनातन संस्कृति पर कुठाराघात सदियों से चला आ रहा है। यह कुचक्र बर्बर मुस्लिम आक्रमण और मुगल शासन से लेकर अंग्रेजी शासन के समय मैकाले मिनट्स और उससे उपजी शिक्षा नीति से चर्मोत्कर्ष पर पहुंचा। स्वतंत्रता के बाद जहां तत्कालीन केंद्र सरकार के इशारे पर इतिहास और सनातन संस्कृति को तोड़-मरोड़कर लिखा गया, वहीं रही-सही कसर वामपंथियों द्वारा इंदिरा सरकार में शिक्षा और संस्कृति के केंद्रों में वामपंथी इतिहासकारों और तथाकथित विद्वानों की घुसपैठ से पूरा हो गया। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों या अर्बन नक्सलियों ने मार्क्सवादी संस्कृति को भारतीय सनातन संस्कृति पर थोपने के लिए न सिर्फ शिक्षण संस्थानों अपितु मीडिया, फिल्मों, फिल्मी कलाकारों और अब न्यायपालिका तक अपनी घुसपैठ बना ली। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अपनी आयातित विचारधारा को थोपने और एक सम्प्रदाय विशेष का तुष्टिकरण करने हेतु न सिर्फ कांग्रेस और तथाकथित सेक्युलर क्षेत्रीय दलों का सहारा लिया अपितु पाठ्यक्रम एवं पाठ्य सामग्री, फिल्मों, विज्ञापन और मीडिया के सहारे सनातन संस्कृति पर सतत प्रयास जारी रखा और काफी हद तक सफल हुए। भारतीय संस्कृति पर वामपंथी इकोसिस्टम इतना हमलावर हो गया है कि न सिर्फ तीज-त्योहार बल्कि व्यक्ति विशेष के पहनावे, पूजा-पद्धति, संस्कारों और घर के अंदर तक आ पहुंचा है।
भारतीय संस्कृति एवं हिंदुत्व को छिन्न-भिन्न करने के सतत प्रयास को समझने के लिए वामपंथी इकोसिस्टम को समझना आवश्यक है। स्वतंत्रता पूर्व मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म पर जो कुठाराघात किया गया वही आवरण वामपंथियों एवं अर्बन नक्सलियों ने आज़ादी के बाद ओढ़ लिया। पहले उन्होंने कांग्रेस और उनकी सरकारों पर दबाव बनाया और बाद में कांग्रेस के साथ मिलकर राष्ट्रवादी सरकारों का विरोध और साम्प्रदायिकता के नाम पर सनातन संस्कृति के खिलाफ खुलकर विरोध करने लगे।
2014 के बाद वामपंथियों का चेहरा पूरी तरह से बेनकाब हो गया। उनके इस इकोसिस्टम में न सिर्फ अर्बन नक्सली ही बेनकाब हुए बल्कि कांग्रेस, तथाकथित सेक्युलर दल, वकील, पत्रकार, फिल्मी कलाकार और विदेशी ताकतें भी बेनकाब हुईं।
सकारात्मक आलोचना लोकतंत्र का एक मौलिक तत्व है किंतु आलोचना जब विरोध-प्रतिरोध की संस्कृति बन जाय तो वह लोकतंत्र के लिए घातक है। 2014 और 2019 के चुनाव में भाजपा की जीत और वामपंथियों का पूरी तरह सफाया हो जाने के बाद मार्क्सवादी, अर्बन नक्सलियों ने कांग्रेस के कंधे पर सवार होकर हिंदुत्व और सनातन संस्कृति पर चौतरफा एवं निर्णायक युद्ध छेड़ दिया है। उनका मूल उद्देश्य हिन्दू धर्म, रीति-रिवाज, परंपरा और त्योहारों पर आघात करना, रूढ़िवादी, दकियानूसी एवं पिछडेपन का बताना और इस प्रकार हिंदू धर्म को सामाजिक, सांस्कृतिक और जातीय आधार पर बांटना है।
सेकुलरिज्म के नाम पर हमारे त्योहार जैसे करवाचौथ को नारी उत्पीड़न कहना, दशहरा एवं गणेशचतुर्थी पर मूर्ति स्थापना को फिजूलखर्ची, नवरात्रि पर आयोजित होने वाले गरवा और अन्य आयोजन को महिलाओं से छेड़छाड़ का माध्यम बताना। पिछले कुछ वर्षों से अर्बन नक्सली और छद्म सेक्युलर वकीलों ने न्यायपालिका के माध्यम से दीपावली को ध्वनि प्रदूषण का माध्यम बताकर पटाखों पर रोक लगवाने में सफल हुए हैं और इसे फिजूलखर्ची बता रहे हैं।
इतना ही नही इन्होंने हमारी परंपरा जैसे चोटी (शिखा) रखना धर्मिक ढोंग, यज्ञोपवीत पहनने को धार्मिक कट्टरवाद, तिलक लगाने को दकियानूसी एवं कट्टरता, कर्ण (कान) छेदन को असभ्य क्रूरता, पितृपक्ष तर्पण को ढोंग, तीर्थ-यात्रा पैसा कमाने का मनुवादी ढोंग कहते हैं। वामपंथियों के अनुसार जल्लीकट्टू एक पशु उत्पीड़न है, गौरक्षा मांसाहार के अधिकार का हनन है, संस्कृत गुरुकुल धार्मिक कट्टरवाद सिखाते थे, व्रत-उपवास दकियानूसी है।
इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद और इसके पैरोकार राजनीतिक दल भारतीय राजनीति से ओझल हो चुके हैं कितु अर्बन नक्सलियों के रूप में अभी उनकी उपस्थिति है। कांग्रेस द्वारा सॉफ्ट हिंदुत्व का आवरण ओढ़ने के बावजूद मार्क्सवादी उन्हें अपनी राजनीतिक बैसाखी बनाने से कोई गुरेज नही कर रहे हैं। यह सुविधा की राजनीति भारतीय लोकतंत्र, सनातन संस्कृति और सामाजिक ताने बाने के घातक है जिसे न सिर्फ सरकार बल्कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया के माध्यम से जनचेतना जगाकर सामाजिक और सांस्कृतिक एकता बनाए रखने का प्रयास करना होगा।

डॉ. संजय वर्मा 




