भारत को पर्व एवं त्योहारों का देश कहा जाता है। वर्ष के बारह महिनों में हर माह कोई न कोई पर्व मनाया जाता है। देश में मनाए जाने वाले हर पर्व का सांस्कृतिक, पौराणिक एवं धार्मिक महत्व होता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाये जाने वाला होली का त्योहार बसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है।
भारत को पर्व एवं त्योहारों का देश कहा जाता है। वर्ष के बारह महिनों में हर माह कोई न कोई पर्व मनाया जाता है। देश में मनाए जाने वाले हर पर्व का सांस्कृतिक, पौराणिक एवं धार्मिक महत्व होता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाये जाने वाला होली का त्योहार बसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है।
भारत में प्राचीन काल से होली का पर्व मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण तो इस रंगोत्सव को बहुत उमंग और उल्लास के साथ मनाते थे। होली का पौराणिक एवं धार्मिक महत्व भी है। प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम के शक्तिशाली राजा ने सभी देशवासियों को आदेश दिया कि उसकी ईश्वर की तरह पूजा की जाए। सारी प्रजा भय के कारण उसे ईश्वर मान कर पूज रही थी मगर उसके पुत्र प्रह्लाद ने अपने पिता की पूजा के स्थान पर भगवान विष्णु जी की पूजा शुरू कर दी। सारे राज्य में जब यह बात फैली तो हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से भयभीत किया और कष्ट दिए। मगर प्रह्लाद पिता के आक्रोश से तनिक भी भयभीत नहीं हुए। आखिरकार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ प्रह्लाद को जलाकर मार डालने की योजना बनाई। होलिका के पास एक ऐसा वस्त्र था जिसे धारण करने के बाद अग्नि उसे नुकसान नहीं पहुंचाती थी। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि की जलती चिता में बैठ गई। मगर उसी पल वह वस्त्र होलिका के शरीर से उड़कर प्रह्लाद के शरीर पर आ गया। धधकती आग की ज्वाला में होलिका भस्म हो गई और प्रह्लाद बच गए। पौराणिक हिंदू मान्यताओं के अनुसार इसी दिन नए संवत का आरंभ होता है। इसी दिन पृथ्वी पर मनु का जन्म हुआ था। इसी दिन को कामदेव के पुनर्जन्म का दिन माना जाता है। इसी दिन भगवान श्री विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे जिन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था। इस दिन भक्तों द्वारा भगवान विष्णु का व्रत भी रखा जाता है। प्राचीन समय से ही बुराई, अहंकार और नकारात्मकता के खात्मे के लिए भारत में होली का पर्व मनाया जा रहा हैं।
देश के सभी हिस्सों में होली का उत्सव रंग, अबीर और पानी की फुहारों के साथ मनाया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन लोग दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ रंगोत्सव का त्योहार मनाते है। ब्रज में होली का पर्व अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। प्राचीनकाल में भगवान श्रीकृष्ण गोपियों एवं राधारानी के साथ हास्यपरिहास और नृत्य के बीच होली खेलते थे। यह प्राचीन परंपरा आज भी ब्रज मंड़ल में चली आ रही है जहां विभिन्न प्रकार से होली खेली जाती है। जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों पर्यटक प्रतिवर्ष ब्रज में पहुंचते है। होली को क्षमा का पर्व भी कहा जाता है इस दिन लोग शत्रुता भुलाकर आपसी मतभेद समाप्त कर एक दूसरे को गले लगाते हैं। घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाएं जाते है। खासतौर पर गुंझिया और दही बड़े मेहमानों को परोसे जाते हैं।

नरेन्द्र कुमार वर्मा


