नागपुर – श्री विजयादशमी उत्सव 2026 में प्रमुख अतिथि संजय गुप्ता जी का उद्बोधन

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देशवासियों में चरित्र निर्माण सर्वोपरि है। अच्छे चरित्र का व्यक्ति राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को भली भांति समझता है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कर्तव्य एक चरित्रवान नागरिक के जरुरी पहलू हैं। आज अगर भारत को उस स्वर्णिम काल को वापस लाना है तो बिना चरित्र निर्माण के यह संभव नहीं है।

आदरणीय मोहन भागवत जी एवं यहां पर उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता, देवियों और सज्जनों।

आप सभी को विजयादशमी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर बधाई। मैं कृतज्ञ हूं कि आपने मुझे इस महान पर्व पर आमंत्रित किया और यह मेरे लिए बहुत ही गर्व की बात है। संघ के 101वें स्थापना दिवस पर यह आयोजन एक अलग महत्व रखता है। 101 वर्ष पूर्व जब संघ की स्थापना हुई थी, तब भारत स्वतंत्र नहीं था और उस समय की सामाजिक स्थितियां भी बहुत अलग थीं। लिहाजा संघ स्थापना की मूल अवधारणा और उद्देश्य जहां हिन्दू समाज की एकता एवं उसे सामर्थ्यवान बनाना था, वहीं राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलाना भी उसका प्रमुख उद्देश्य था। संघ की तत्कालीन धारणा थी कि समाज को पराधीनता की मानसिकता से उबार कर स्व-बोध के बिना वास्तविक स्वतंत्रता की कल्पना नहीं की जा सकती।

भारत स्वतंत्र हुआ और स्वतंत्रता के बाद संघ ने व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ भारतीयता और राष्ट्र निष्ठा को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया। संघ की इस पवित्र विचारधारा को, आजादी के बाद सत्ता प्रतिष्ठान में विराजमान राजनीतिकों और राजनीति के एक वर्ग ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि संघ की विचारधारा उनके तुष्टीकरण के एजेंडे से मेल नहीं खाती थी, फिर भी तमाम चुनौतियों के बावजूद संघ अपने मार्ग पर निरंतर बढ़ता रहा। भारत के गणतंत्र होते ही संघ के कार्यों-विचारों से प्रेरित होकर विशुद्ध भारतीयता में विश्वास रखने वाले अनेक राजनीतिकों ने अपने विचारों को बदला और कुछ राष्ट्र निष्ठ विचारकों के साथ मिलकर जनसंघ की स्थापना की। बाद में यही जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी के रूप में आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई है। आज इस पार्टी के शीर्ष पर बैठे हुए नेताओं के साथ-साथ अनेक नेताओं के अंदर भारतीयता, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कारों का जो बोध है, वह उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही मिला है। लिहाजा यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इस पार्टी की सफलता के पीछे संघ की ही दृढ़ वैचारिकता और उसकी संगठन शक्ति है।

संघ के साथ-साथ उसके आनुषांगिक और विचारों से प्रेरित संगठन, जिसमें भारतीय जनता पार्टी शामिल है, पर लगातार आरोप लगते हैं कि वह हिन्दू अतिवाद को बढ़ावा देता है। पर, आज यदि संघ नहीं होता तो हिन्दू संस्कार, हिन्दू जीवन पद्धति न जाने कब के विलुप्त हो गए होते। पहले मुगलों का और फिर अंग्रेजों का शासन। लगभग छह सौ वर्षों की गुलामी के बाद अगर आज भारतीयता और हिन्दुत्व की विश्व में अपनी धमक है तो इसका श्रेय प्रमुख रूप से संघ को दिया जाना चाहिए।

शताब्दी वर्ष के उपरांत संघ अगले 100 वर्ष के लिए समाज में निरंतर बदलाव लाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना के उद्देश्यों पर कार्य कर रहा है क्योंकि चुनौतियां अभी बहुत हैं। सामाजिक कुरीतियां जो समय के साथ घर करने लगती हैं, उन्हें दूर करने के लिए संघ जैसी संस्थाओं की हमेशा आवश्यकता पड़ती है क्योंकि संघ निष्काम भाव से अपना कार्य करता है। वैसे तो सामाजिक सुधार की जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों पर भी है, पर वोट की राजनीति के चलते राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक अलग तरह की सामाजिक बीमारी को जन्म दे देती है। ऐसे में कुछ राजनीतिक नेताओं को छोड़ दें तो अधिकांश पर जनता को कम से कम अपने स्वयं विकास के मामले में उन पर भरोसा नहीं होता। ऐसे में संघ और संघ प्रेरित संगठनों की आवश्यकता और सामयिकता अधिक बढ़ जाती है।

आज भारत में तेज आर्थिक प्रगति हो रही है और सब कुछ ठीक चला, तो आने वाले 20-25 वर्षों में हम वास्तव में एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में सामने आएंगे। पर, क्या यह समृ‌द्धि हमारी चेतना-अवचेतना को भी समृद्ध करेगी? इस पर संशय है क्योंकि आज का समाज जाति-पाति, वर्गभेद और पंथ-मजहब के पालों में बंटा हुआ है, जिसके कारण सहिष्णुता का अत्यधिक अभाव दिखता है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा तो है, पर अभी भी बड़ी संख्या में नागरिकों में उस नैतिकता, कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व के बोध का अभाव है, जिससे कि राष्ट्र एवं समाज को और अधिक श्रेष्ठ बनाने के लिए जो विधि-विधान हैं, वह उनको मानें और उनका पालन करें। आज के समाज में जो एक और कमी दिख रही है, वह है अनुशासित नहीं होने की। अधिकांश नागरिक इस सोच में रहते हैं कि यह तंत्र व्यवस्था देश मुझे क्या दे रहा है, जबकि उसकी सोच होनी चाहिए कि… देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें। राष्ट्र के लिए एक नागरिक के क्या-क्या कर्तव्य हैं, ऐसी सोच का बहुधा अभाव दिखता है। इन सब चुनौतियों को संघ ने बहुत बेहतर तरीके से समझा है और लगातार इस पर कार्य कर रहा है।

दैनिक जागरण अखबार की भी संपादकीय नीति में यही है। हमारे समाचार पत्र की नीति कहती है कि “दैनिक जागरण एक आस्तिक, आस्थावान, राष्ट्रभक्त और सनातन भारतीय मूल्यों का संवाहक समाचार पत्र है। जिसके संस्कार ही सनातन भारतीय हैं। ऐसा समाचार पत्र, जिसकी नियति और प्रकृति में पूर्ण आस्था है। जो सकारात्मक सोच के साथ समरसता व स‌द्भावना का आचरण अपनाते हुए, अपने पाठकों को भी इसके लिए निरंतर प्रेरित करता है। जिसका लक्ष्य देशवासियों में, इस भावना को जागृत करना भी है कि वो देश के लिए क्या कर सकते हैं, देश को क्या दे सकते हैं?”

देखा जाए तो संघ और जागरण की विचारधारा, भारतीय सनातन संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा एवं समर्पण के बिंदु पर एक ही है। एक विशाल और उत्तरदायी समाचार-विचार समूह होने के नाते दैनिक जागरण, अपनी यह नैतिक जिम्मेदारी समझता है कि नागरिकों को उनके कर्तव्य के प्रति लगातार सजग करता रहे। जागरण अपने सात सरोकारों के माध्यम से सामाजिक-राष्ट्रीय उत्थान की दिशा में निरंतर प्रयासरत है। जागरण के यह सरोकार हैं, सुशिक्षित समाज, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, स्वस्थ समाज, नारी सशक्तिकरण, गरीबी उन्मूलन तथा जनसंख्या नियोजन।

आज भी देश में कतिपय राजनीतिक दल और अनेक सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्व को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत देश में कोई भी ऐसा संगठन नहीं था, जो सनातन भारतीय मूल्यों का प्रचार-प्रसार करता और जनमानस में उन मूल्यों के महत्व को समझाता। किसी भी राष्ट्र के लोगों के संस्कार और मूल्य ही उसको परिभाषित करते हैं। आज अगर भारत का अंतरराष्ट्रीय पटल पर कोई महत्व स्वतंत्रता के बाद है तो उसकी अपनी आर्थिक क्षमता का एक बड़ा योगदान तो है ही, पर यदि इस आयाम को एक बार अलग भी कर दें तो इस भूभाग के संस्कारों का भी आज के युग में अपना एक महत्व है, जैसा कि हजारों वर्ष पूर्व था। आज भारतीय सांस्कृतिक भूभाग में अनेक पंथ, जीवन पद्धतियां प्रचलित हैं। निश्चित रूप से इस बात के पूरे प्रमाण हैं कि यह सारे पंथ, पद्धतियां हिन्दू मूल से ही निकलीं। उस समय तात्कालिक रूप से हिन्दू जीवन शैली में जो विसंगतियां उत्पन्न हुईं, प्रचलित हुईं, अनेक पंथ, उन विसंगतियों के कारण ही पनपे। इसे स्वतंत्र भारत के नजरिये से देखें, तो अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उसके मूल्यों से प्रेरित संगठन ना हों तो वह दिन दूर नहीं जब वर्तमान स्वरूप की हिन्दू जीवन पद्धति जाति-पाति के आधार पर संविधान में अलग से परिभाषित हो जाए और एक बार फिर हिन्दू समाज बंट जाए।

पिछली सदी में जहां संघ का ध्यान तुष्टीकरण के कारण हिन्दू समाज के सामने उत्पन्न तमाम चुनौतियों को दूर करना था, वहीं अगली शताब्दी के लिए जो चुनौतियां संघ ने ली हैं, उसमें देशवासियों में चरित्र निर्माण सर्वोपरि है। अच्छे चरित्र का व्यक्ति राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को भली भांति समझता है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कर्तव्य एक चरित्रवान नागरिक के जरुरी पहलू हैं। आज अगर भारत को उस स्वर्णिम काल को वापस लाना है तो बिना चरित्र निर्माण के यह संभव नहीं है।

अन्याय पर न्याय और असत्य पर सत्य की विजय के इस पर्व पर संघ नेतृत्व ने आज मुझे जो अवसर दिया, उसके लिए हम एक बार पुनः कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं। हम अपने पूरे जागरण समूह की ओर से सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करते हैं कि वह भारत को परम वैभव के शिखर पर ले जाने के लिए सतत प्रयासरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को और सामर्थ्यवान बनाए।

 

भारत माता की जय

 

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