सरसंघचालक जी ने शनिवार को जनजाति बाहुल्य क्षेत्र मझगवाँ -सतना में स्थित दीनदयाल शोध संस्थान, महर्षि वाल्मीकि परिषर में नव स्थापित वीरांगना रानी दुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया।
मझगवां। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य एवं पराक्रम के कारण इस क्षेत्र को स्पर्श करने में आक्रांताओं को दो से तीन दशक तक का समय लग गया। रानी दुर्गावती के व्यक्तित्व एवं कार्यशैली से प्रभावित यहां के लोगों ने आपस के विवादों से दूर रहकर विदेशियों से सतत संघर्ष किया। यहां के लोगों ने अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए कभी भी देश का अहित करने का नहीं सोचा।
सरसंघचालक जी ने शनिवार को जनजाति बाहुल्य क्षेत्र मझगवाँ -सतना में स्थित दीनदयाल शोध संस्थान, महर्षि वाल्मीकि परिषर में नव स्थापित वीरांगना रानी दुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया।
कार्यक्रम में मंच पर मण्डला के दिगंबर स्वामी मदन मोहन गिरी महाराज, वीरेन्द्र पराक्रमादित्य अध्यक्ष दीनदयाल शोध संस्थान, चूडामणि सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता), बुद्धा मवासी, बेटाई काका (नानाजी देशमुख के सहयोगी कार्यकर्ता), रामराज सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता), अतुल जैन प्रधान सचिव दीनदयाल शोध संस्थान उपस्थित रहे।
सरसंघचालक जी ने रानी दुर्गावती के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रानी दुर्गावती के जीवन से हमें सीख लेनी चाहिए कि राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्र का सम्मान सर्वोपरि होता है, व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए देश को आहत करने के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए। राष्ट्र के विकास में समाज के सभी वर्गों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
उन्होंने कहा कि वीरांगना रानी दुर्गावती के विषय में, उनकी शौर्य गाथा और उनके पराक्रम से सभी परिचित हैं। दीनदयाल शोध संस्थान के इस परिसर में रानी दुर्गावती की प्रतिमा लगाने से उनकी छवि जनमानस में निरंतर उभरती रहेगी और लोग उनकी सद्प्रेरणा से सदैव प्रेरित होते रहेंगे।
वीरांगना रानी दुर्गावती के कौशल को बताते हुए कहा कि वह प्रजाप्रिय एवं प्रजा की हितैषी तथा न्याय पालक थीं। पति की मृत्यु के पश्चात उन्होंने व्यक्तिगत दुःख में अपने को नहीं धकेला, बल्कि अपनी प्रजा के कल्याण एवं प्रजा के हित में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया, जिसका परिणाम यह रहा कि आक्रांताओं को इस क्षेत्र में कब्जा पाने के लिए 20 से 30 वर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ी।
रानी दुर्गावती अपने लोगों द्वारा की गई किसी गलती के लिए उन्हें दंडित करने की पक्षधर नहीं, बल्कि उसे क्षमा कर भूल सुधारने की हिमायती थी। वीरांगना रानी दुर्गावती अपनी वीरता के कारण कभी किसी से पराजित नहीं हुई, बल्कि विश्वासघात की शिकार हुईं। इससे सीख लेनी चाहिए कि हम सभी राष्ट्र प्रेमीजनों का दायित्व है कि देश हित में कभी भी कोई विश्वासघात ना करने पाए।
भारतरत्न राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों को इस क्षेत्र की सेवा में समर्पित कर दिया। यहां के निवासियों को स्वावलम्बी एवं स्वाभिमानी बनाने के लिए तैयार किया है। जनजातीय, वनवासियों बन्धुओं की बड़ी आबादी वाले इस क्षेत्र में प्रभु श्री राम ने अपने 14 वर्षों के वनवासकाल में से साढ़े ग्यारह वर्ष का समय व्यतीत किया है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि गोंडवाना रानी दुर्गावती का एक समृद्ध राज्य था। धन - धान्य से परिपूर्ण था। पति के बाद रानी दुर्गावती ने राज्य संभाल कर प्रजा को सुख, समृद्धि और सम्मान दिया। राज्य की आर्थिक समृद्धि का ध्यान रखा। इसी सब वैशिष्ट्य को जन-जन से परिचित कराने के लिए रानी दुर्गावती की प्रतिमा स्थापित की गई है। बगैर किसी भेदभाव के राष्ट्र के कल्याण एवं सुरक्षा के लिए आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश है, हम इससे अलग नहीं।

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