स्कार उत्तम बनाने की प्रक्रिया है। पशु की भांति रहने वाले मनुष्यों को मानव बनाने के लिए तथा मानव को देवत्व तक ऊँचा उठाते हुए, उसमे माधव बनने की सुपात्रता संवर्धित करना केवल संस्कारों से ही संभव है। इसलिए घर के बुजुर्ग बच्चों को कालानुकुल प्रदान करने योग्य अति अमूल्य धरोहर ये संस्कार होते हैं।
घर केवल इमारत, आश्रयस्थान, उपहारगृह, भोजनालय या विश्रामधाम नहीं है। घर वहां वास करने वालों को उत्तम बनाने वाला एक संस्कार केंद्र है। बड़ों की बात सुनते हुए, उनका आचरण देख सुनकर, बच्चे द्वारा स्वयं उनकी आदतें लगा लेते हुए, प्रयोग करते हुए, संवर्धित होने का संस्कार केंद्र है। वैसा घर ही कुटुंब होता है।
संस्कार उत्तम बनाने की प्रक्रिया है। पशु की भांति रहने वाले मनुष्यों को मानव बनाने के लिए तथा मानव को देवत्व तक ऊँचा उठाते हुए, उसमे माधव बनने की सुपात्रता संवर्धित करना केवल संस्कारों से ही संभव है। इसलिए घर के बुजुर्ग बच्चों को कालानुकुल प्रदान करने योग्य अति अमूल्य धरोहर ये संस्कार होते हैं।
अपने प्राचीन ऋषियों ने मानव जीवन में मानव को माधव बनाने हेतु 16 संस्कारों की परिकल्पना की है। उनमें जन्म से पहले तीन, जन्म के बाद 12 तथा मरणोपरांत एक ऐसे जीवन में 16 संस्कार प्राप्त करने चाहिए।
जन्म से पहले तीन: गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन
जन्म के बाद 12: जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, निष्क्रमण, कर्णवेध, चौल, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशान्त, समावर्तन व विवाह।
मृत्यु के बाद एक: अंत्येष्टि।
इस प्रकार यह सोलह संस्कार है। आधुनिक जमाने में सब संस्कार प्राप्त कर सकने वाले आचार्य पुरुष नहीं है। अतः 16 केवल नामों का ही यहां उल्लेख किया है। इनमें से कुछ का अनुसरण हमने किया तो हमारा जीवन उदात्त होगा इसी भाव से यहां उल्लेख किया है।
नामकरण
जन्म लेने वाले हर बच्चे को एक आकर्षक, अन्वर्थक नाम रखना चाहिए। उनको नाम से पुकारने पर बुलाने वाले को भी आनंद देने जैसा और बुलाए गए व्यक्ति में भी श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न होने जैसा नाम रखना चाहिए। नामकरण में जन्मे बच्चे का नक्षत्र, वंश, माता-पिता की इच्छा आदि विभिन्न बातों का ध्यान रखते हुए नाम का चयन किया जाता है। इस प्रकार के नामकरण में यही उद्देश्य होता है कि वह बच्चे को अपने वंश, परंपरा के बारे में आगे का प्रकाश प्रदान कर सकने वाला हो।
विद्यारंभ
बच्चा जन्म से ही, जन्म से पहले ही अनेक बातें माता से, कुल से, परिसर से सीखना शुरू कर देता है; तो भी किसी एक शुभ मुहूर्त पर बच्चे का औपचारिक विद्यारंभ करा देना चाहिए। विद्यारंभ में अक्षराभ्यास भी एक कड़ी है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बच्चे के हाथ, आंखें, मुख, मन सब कुछ एक काल में काम करने की शुरुआत करने का साहस होता है। इसे तीसरे तथा पांचवे वर्ष में करते हैं। ॐ से प्रारंभ होकर नमः से अंत होने वाले किसी भी मंत्र को चावल या गेहूं के ऊपर लिखवाते हैं। घर का बुजुर्ग व्यक्ति बच्चे को अपनी गोद में बिठाकर स्वयं पूर्वाभिमुखी बैठकर लिखावट करते समय बच्चे के मुख से भी कहलवाते हुए लिखवाता है। सामान्यत: यह संस्कार घर में ही दे सकते हैं फिर भी मंदिरों या तीर्थ स्थलों में जाते हुए भी किया जा सकता है।
विवाह
श्रेष्ठ संतति निर्माण करने हेतु घराने के आशय को आगे जारी रखने के लिए, परिवारों को जोड़ते हुए समाज को शक्तिशाली बनाने का संस्कार ही विवाह है। नर-नारी दोनों अपने जीवन में परस्पर पूरक बनकर समूचे जीवन भर एकत्रित जीवन यापन करते हुए वंश व वंश की परंपराओं को आगे जारी रखने का सत्संकल्प करने का संस्कार है यह। यह केवल स्वतः के सुखार्थ या कामपुर्तता मात्र के लिए नहीं है; उसके विपरीत यह नई जिम्मेदारी स्वीकारने, धर्मनिष्ठा, कर्तव्य भाव, वृद्धिगत करने का प्रसंग होता है। यह दो परिवारों व समाज के बुजुर्गों के सम्मुख दोनों व्यक्तियों द्वारा एक वृत्त स्वीकारने का संदर्भ होता है। यह व्यक्तियों के जीवन में अति महत्वपूर्ण मुहूर्त है।
अंत्येष्टि
संसार में जन्म लेने वाला हर कोई मरता है। यहां कोई भी प्राणी या वस्तु शाश्वत नहीं है। यह मनुष्य पर भी लागू है। शरीर से प्राणों का निर्गमन ही मरण, मृत्यु है। मरण सहज व निश्चित है। अतः मृत्यु से घबराना नहीं, यह अनुभव की बात है। निष्प्राण शव कचरे के समान, असहनीय होता है। वैसा ना हो, इसलिए हर परिवार को अपने घराने से संबंधित शवों को गौरवपूर्वक विसर्जित करना चाहिए। पंचभूतों से बने इस शरीर को पंचभूतों में से किसी एक के जरिए पंचभूतों में विलीन करना चाहिए। अतीव गौरव से करना चाहिए। दहन, दफन, प्रवाहित करना या किसी अति ऊंची जगह पर पक्षियों के आहार के रूप में रखना ऐसी अनेक पद्धतियां है। सभी पद्धतियों के मूल में केवल अतीव गौरव – आदर भाव ही निहित होता है। कोई भी पद्धति हीन नहीं है। नीति यही है कि शवों को सम्मान के साथ विसर्जित करना है। सामान्यत: संबंधितों को ही अंत्यसंस्कार करना चाहिए। अपने धर्मशास्त्र कहते हैं कि अनाथो के शवसंस्कार करने वालों को सहस्त्र गो दान करने का पुण्य प्राप्त होता है।
इस तरह 4-6 संस्कार तो हर एक को प्राप्त होने ही चाहिए। अपने समाज में 16 संस्कारों की बात करने वाले लोग जैसे हैं; वैसे ही 64 संस्कार है, ऐसा कहने वाले भी हैं। कुल मिलाके, संस्कारों की संख्या की तुलना में किस कुटुंब में कौन से संस्कार प्रदान किए जाते हैं; उसे कैसे उत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं, यही ध्यान देने योग्य बात है।
- साभार परिवार प्रबोधन पुस्तक

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