राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर एक महान विचारक थे। जिन्हें जन-साधारण श्री गुरूजी के नाम से जानते थे। श्री गुरूजी का अध्ययन व चिंतन इतना सर्वश्रेष्ठ था कि वे देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज ही नहीं बने अपितु पूरे राष्ट्र के प्रेरक पुंज व दिशा निर्देशक बन गए थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर एक महान विचारक थे। जिन्हें जन-साधारण श्री गुरूजी के नाम से जानते थे। श्री गुरूजी का अध्ययन व चिंतन इतना सर्वश्रेष्ठ था कि वे देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज ही नहीं बने अपितु पूरे राष्ट्र के प्रेरक पुंज व दिशा निर्देशक बन गए थे।
श्री गुरूजी का जन्म फाल्गुन मास की एकादशी संवत् 1963 तदनुसार 19 फ़रवरी, 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। इस वर्ष श्री गुरूजी की जन्म जयंती रविवार 16 फरवरी 2023 को है।
श्री गुरुजी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संपर्क बनारस में हुआ। भैयाजी दाणी तथा नानाजी व्यास ने बनारस में संघ की शाखा प्रारंभ की। जब 1931 में श्रीगुरुजी ने विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया तो उनकी लोकप्रियता के कारण भैयाजी दाणी ने संघ-कार्य एवं संगठन के लिए उनसे संपर्क किया। संघ के स्वयंसेवक अध्ययन में श्रीगुरुजी की मदद लेते और उनके भाषणों का आयोजन भी करते थे।
डॉ. हेडगेवार के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणादायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। वर्ष 1938 के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया।
श्रीगुरुजी ने 1942 में पूना में प्रांतीय बैठक में संघ में अपने प्रवेश पर कहा, “मैं तो रहा एक दम बहुत ही यहाँ-वहाँ घूमने वाला, फिर भी पता नहीं मुझ पर कैसे संस्कार हो गया। इस तथ्य को या तो भगवान ही जानता है या संस्कार डालने वाला। एक बार भूल से डाक्टर जी का भाषण सुनने बैठ गया, मुझे अपनी बुध्दि पर बड़ा घमण्ड था, उस भाषण में न तो कोई तर्क था, न कोई इतिहास का हवाला, न दर्शन था, न कोई बड़ा सिद्धांत। डाक्टर जी ने कहा था कि बस इतना ही स्वयंसेवक बन्धुओं काम करते जाइये, निष्ठापूर्वक काम करते जाइये, प्रेम से काम करते जाइये, मैंने सोचा कि यह मात्र तोता-रटन है…… उसका मूल्य मैंने जाना नहीं…… किन्तु अब सब भुला बैठा हूँ मैं। उस भाषण में मुझे पाण्डित्य नहीं दिखाई दिया…… उस भाषण में आर्द्रता थी…… किन्तु डाक्टर जी का भाषण अन्त: करण की एक-एक तह पार करता हुआ गहरा उतर गया..... परन्तु डाक्टर जी के भाषण में हार्दिकता थी, लगन थी। मैं नहीं कह सकता कि कैसे उनका भाषण मेरे अन्त: करण में उतरता चला गया। बीच-बीच में उनसे भेंट-मुलाकात होती रही। डाक्टर जी ने मेरे अभिमान को झकझोर दिया।” (राधोश्याम बांका, श्री गुरुजी जीवन प्रसंग, भाग 2, पृष्ठ 17-18)
वर्ष 1939 में गुरूजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरकार्यवाह बनाया गया था। 1940 में डॉ. हेडगेवार का ज्वर बढता ही चला गया और अपने जीवन का अंत समय जानकर उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने श्री गुरूजी को पास बुलाया और कहा “अब आप ही संघ कार्य संभाले”। और 21 जून 1940 को डॉ हेडगेवार का स्वर्गवास हो गया। इस तरह गुरूजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक का दायित्व मिला।
5 जून 1973 के दिन नागपुर में गुरूजी अनंत में लीन हो गए। गुरूजी का धर्मग्रन्थों एवं विराट हिन्दू दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था जिसे उन्होंने राष्ट्र सेवा और संघ के दायित्व की वजह से सहर्ष अस्वीकार कर दिया। यदि वो चाहते तो शंकराचार्य बन कर पूजे जा सकते थे किन्तु उन्होंने राष्ट्र और धर्म सेवा दोनों के लिए संघ का ही मार्ग उपयुक्त माना।

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