आज का दिन: शुक्रवार पौष शुक्ल अष्टमी विक्रम संवत 2079 तदनुसार 30 दिसंबर 2022
आज का दिन
शुक्रवार पौष शुक्ल अष्टमी विक्रम संवत 2079 तदनुसार 30 दिसंबर 2022
उक्यांग नागवा बलिदान दिवस
आज मेघालय के क्रांतिवीर उक्यांग नागवा का बलिदान दिवस है। उक्यांग नागवा मेघालय के एक क्रान्तिकारी वीर थे। 18 वीं शती में मेघालय की पहाड़ियों पर अंग्रेजों का शासन नहीं था। वहाँ खासी और जयन्तियाँ जनजातियाँ स्वतन्त्र रूप से रहती थीं। इस क्षेत्र में आज के बांग्लादेश और सिल्चर के 30 छोटे-छोटे राज्य थे। इनमें से एक जयन्तियापुर था।
अंग्रेजों ने जब यहाँ हमला किया, तो उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अन्तर्गत जयन्तियापुर को पहाड़ी और मैदानी भागों में बाँट दिया। इसी के साथ उन्होंने निर्धन वनवासियों को धर्मान्तरित करना भी प्रारम्भ किया। राज्य के शासक ने भयवश इस विभाजन को मान लिया; पर जनता और मन्त्रिपरिषद ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने राजा के बदले उक्यांग नागवा को अपना नेता चुन लिया। उक्यांग ने जनजातीय वीरों की सेना बनाकर जोनोई की ओर बढ़ रहे अंग्रेजों का मुकाबला किया और उन्हें पराजित कर दिया।
उसके बाद अंग्रेजी सत्ता के साथ उनका संघर्ष निरंतर चलता रहा। अंग्रेजों ने इन संघर्षों में घायल उक्यांग को अंततः पकड़ लिया।
अंग्रेजों ने प्रस्ताव रखा कि यदि तुम्हारे सब सैनिक आत्मसमर्पण कर दें, तो हम तुम्हें छोड़ देंगे; पर वीर उक्यांग नागवा ने इसे स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचार भी उनका मस्तक झुका नहीं पाये। अन्ततः 30 दिसम्बर, 1862 को उन्होंने मेघालय के उस वनवासी वीर को सार्वजनिक रूप से जोनोई में ही फाँसी दे दी।
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जन्म दिवस
30 दिसम्बर, 1887 को भरूच (गुजरात) के डिप्टी कलेक्टर श्री माणिक लाल मुंशी के घर में जन्मे श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी कुशलता राजनीति, साहित्य, शिक्षा व धर्मप्रेम के साथ ही प्रकृति संरक्षण के लिए किये गये उनके प्रयासों से भी प्रकट हुई। मुंशी जी बड़ौदा से स्नातक एवं मुंबई से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1913 में मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। बड़ौदा विश्वविद्यालय में पढ़ते समय उनकी भेंट ऋषि अरविंद से हुई। आगे चलकर अरविंद, सरदार पटेल व गांधी जी से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारत की स्वतंत्रता के साथ ही उसके पुनर्निर्माण के बारे में भी विचार किया। हिन्दू धर्म एवं संस्कृति उनके मन, वचन और कर्म में बसी थी। कालान्तर में इसी चिंतन से 1932 में ‘साहित्य संसद’ तथा 1938 में ‘भारतीय विद्या भवन’ जैसी श्रेष्ठ संस्था का जन्म हुआ। भारतीय विद्या भवन की देश भर में 22 शाखाएं हैं। इस संस्था ने देश-विदेश में वेद, उपनिषद, गीता, रामायण जैसे हिन्दू धर्मग्रंथों तथा भारतीय भाषा व संस्कृति के विकास में अप्रतिम योगदान दिया।
मुंशी जी अपने जीवन के अंतिम समय तक देश, धर्म, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान एवं कला की सेवा करते रहे। हिन्दू हितैषी होने के कारण वे विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में भी सहयोगी बने।

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