जनजाति समागम 2026, लाल किला मैदान से जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का राष्ट्रीय आह्वान

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जनजाति सुरक्षा मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 मई 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से राष्ट्रपति भवन में भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने माननीय प्रधानमंत्री को जनजातीय कल्याण से संबंधित महत्वपूर्ण विधिक एवं संवैधानिक प्रश्नों से अवगत कराया। चर्चा तीन प्रमुख मांगों पर केंद्रित रही, प्रथम, लोकुर समिति के मानदंडों के अनुरूप "अनुसूचित जनजाति" की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा निर्धारित की जाए, द्वितीय, संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भांति संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, तृतीय, जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दीर्घकालीन प्रश्न,जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चंद्रमोहन बनाम राज्य (2004) तथा हाल ही में चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026 INSC 283) में भी विचार किया है।

दिल्ली, 29 मई 2026। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में 24 मई को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजाति समागम 2026 जनजातीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और अस्मिता का विराट राष्ट्रीय प्रतीक बनकर सामने आया। देशभर के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों से आए लाखों जनजातीय बंधु-भगिनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, लोकनृत्य, वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इस समागम में सम्मिलित हुए।

राजधानी दिल्ली की सड़कों पर जनजातीय संस्कृति का अद्भुत दृश्य उस समय देखने को मिला, जब राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग और श्यामगिरि मंदिर सहित विभिन्न स्थानों से विशाल शोभायात्राएँ प्रारंभ होकर लाल किला मैदान पहुंचीं। लेह-लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक के जनजातीय समाज ने अपनी वेशभूषा, लोकधुनों, मांदर-ढोल, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से भारत की जनजातीय विरासत की जीवंत झलक प्रस्तुत की।

कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने जनजातीय समाज की आस्था, संस्कृति, प्रकृति-पूजा, जल-जंगल-जमीन और जीवन-पद्धति को भारत की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि यह समागम आने वाले वर्षों में जनजातीय समाज के महाकुंभ के रूप में स्मरण किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज ने बिना लिखित नियमों के "अनेकता में एकता" और "एकता में अनेकता" के मंत्र को जीवन में साकार किया है।

समागम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। सदियों से जनजातीय समाज जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का मार्ग दिखाता रहा है। आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब जनजातीय जीवन-दर्शन टिकाऊ विकास का प्रेरक मॉडल प्रस्तुत करता है।

जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह समागम केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि 75 वर्षों से लंबित उस न्यायपूर्ण माँग की राष्ट्रीय पुनर्युष्टि है, जिसकी प्रतीक्षा आज भी देश का समस्त जनजातीय समाज कर रहा है। मंच ने कहा कि जनजातीय पहचान केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं, बल्कि पारंपरिक आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों, सामाजिक परंपराओं और सामुदायिक जीवन-पद्धति से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

मंच ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक आचारों का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभ प्राप्त नहीं होने चाहिए। मंच के अनुसार, "आस्था का त्याग संस्कृति का त्याग है, और संस्कृति का त्याग पहचान का त्याग है।"

मंच ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों ने भी यह माना है कि यदि धर्मांतरण के बाद कोई व्यक्ति अपने समुदाय की परंपराओं, सामाजिक आचरण और सांस्कृतिक जीवन पद्धति से पूर्णतः विच्छिन्न हो जाता है, तो उसकी जनजातीय पहचान के प्रश्न का परीक्षण सक्षम प्राधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। परंतु व्यवहारिक स्तर पर प्रत्येक मामले को अलग-अलग सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के समक्ष ले जाना सामान्य जनजातीय व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन और अव्यावहारिक है। इसलिए इस विषय पर स्पष्ट, सरल और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

जनजाति सुरक्षा मंच ने स्मरण कराया कि अप्रैल-मई 2009-10 के दौरान 26 राज्यों के 293 जिलों और 26,253 गाँवों में व्यापक अभियान चलाकर वयस्क जनजातीय सदस्यों से 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए गए थे। इन हस्ताक्षरों को संबंधित जिलाधिकारियों और राज्यपालों के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को प्रेषित किया गया था। इसके पश्चात 18 जनवरी 2010 को वरिष्ठ जनजातीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति से भेंट कर इस विषय पर शीघ्र निर्णय का आग्रह किया था।

मंच ने कहा कि वर्ष 2011 से अब तक ग्राम संपर्क अभियान, रैलियाँ, जिला सम्मेलन, 21 राज्यों में विभिन्न कार्यक्रम, प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड तथा लगभग 450 सांसदों से प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से यह अभियान निरंतर संचालित किया जा रहा है।

जनजाति सुरक्षा मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 मई 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से राष्ट्रपति भवन में भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने माननीय प्रधानमंत्री को जनजातीय कल्याण से संबंधित महत्वपूर्ण विधिक एवं संवैधानिक प्रश्नों से अवगत कराया। चर्चा तीन प्रमुख मांगों पर केंद्रित रही, जिन्हें मंच पिछले दो दशकों से उठाता आया है। प्रथम, लोकुर समिति के मानदंडों के अनुरूप "अनुसूचित जनजाति" की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा निर्धारित की जाए, जो वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं के अनुकूल हो। द्वितीय, संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भांति संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में भी आवश्यक संशोधन या स्पष्टीकरण किया जाए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि जो व्यक्ति धर्मांतरण के पश्चात अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों और जीवन-पद्धति का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। तृतीय, जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दीर्घकालीन प्रश्न, जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चंद्रमोहन बनाम राज्य (2004) तथा हाल ही में चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026 INSC 283) में भी विचार किया है।

मंच ने ध्यान दिलाया कि लगभग 12 करोड़ की कुल जनजातीय जनसंख्या में से अनुमानतः 1.5 से 2 करोड़ व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो चुके हैं, और अनेक प्रकरणों में धर्मांतरित जनजातीय व्यक्ति एक ओर अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं तथा दूसरी ओर अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का भी दोहरा लाभ उठा रहे हैं, जो संवैधानिक समता और सामाजिक न्याय की मूल भावना के विरुद्ध है। यह मांग सर्वप्रथम 1970 में स्वर्गीय डॉ. कार्तिक उरांव द्वारा संसद में उठाई गई थी, जिसे उस समय 235 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ था। तब से यह प्रश्न 75 वर्षों से अधिक समय से लंबित है।

प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम राष्ट्रपति से आग्रह किया कि इस विषय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष उसके संवैधानिक अधिदेश के अनुरूप परीक्षण एवं आवश्यक अनुशंसा हेतु प्रेषित किया जाए तथा संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में समुचित संशोधन कर सामान्य जनजातीय नागरिक को प्रत्येक प्रकरण में पृथक न्यायिक कार्यवाही की विवशता से मुक्ति दिलाई जाए।

मंच ने कहा कि यह विषय केवल आरक्षण अथवा विधिक व्याख्या का नहीं, बल्कि करोड़ों जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जनजातीय समाज ने 75 वर्षों से अधिक समय तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की है; अब समय आ गया है कि उसकी न्यायपूर्ण माँग पर शीघ्र और सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

समागम का समापन जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपरागत आस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा हेतु प्रभावी कदम उठाने के राष्ट्रीय आह्वान के साथ हुआ।

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