एकत्व से जुड़े, विविधता से सुसज्जित

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनते। स्वामी विवेकानंद के शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र के पास विश्व को देने के लिए एक संदेश, पूरा करने के लिए एक मिशन और प्राप्त करने के लिए एक नियति होती है।

न्यूयॉर्क, (अमेरिका) 30 अगस्त 2026। न्यूयॉर्क स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त को अमेरिकन हिन्दूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) द्वारा आयोजित “यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन” कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि जब हम अमेरिका, अर्थात् यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, की बात करते हैं, तो एक शब्द की प्रायः चर्चा होती है – “प्लूरलिज़्म” (बहुलतावाद)। वहीं, जब हम भारत की बात करते हैं, तो एक दूसरा शब्द अथवा वाक्यांश सामने आता है – “यूनिटी इन डायवर्सिटी” (विविधता में एकता)। उन्होंने कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता, दोनों उसके डीएनए में हैं।

सरसंघचालक जी ने कहा, “राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं होते। इस ब्रह्मांड की संरचना में राष्ट्रों को एक दायित्व निभाना होता है।” उन्होंने कहा कि हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है। भारत को जो नियति मिली है, वह है विविधता में एकता के सत्य को साकार करना और समय-समय पर पूरी दुनिया को भी इस एकत्व का बोध कराना।

उन्होंने कहा, “हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी वह एकता और भी सुसज्जित होती है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही, हमें इस एकत्व की भावना को ध्यान में रखना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनते। स्वामी विवेकानंद के शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र के पास विश्व को देने के लिए एक संदेश, पूरा करने के लिए एक मिशन और प्राप्त करने के लिए एक नियति होती है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि विश्व में दो प्रवृत्तियाँ हैं। एक प्रवृत्ति कहती है – “जियो और जीने दो।” दूसरी प्रवृत्ति कहती है – “जियो और केवल उन्हें जीने दो, जो हमारी बात मानें।” “जो लोग कहते हैं, ‘यदि आप हमारी बात मानेंगे, तो हम आपकी रक्षा करेंगे’। रक्षा को संस्कृत और हिंदी में ‘रक्षण’ कहा जाता है। इसलिए जो केवल उनकी रक्षा करते हैं, जो उनकी बात मानते हैं, वे राक्षस हैं।”

इसके विपरीत, उन्होंने ऐसी दृष्टि की बात कही, जिसमें यह महत्व नहीं रखता कि कोई व्यक्ति आपकी बात मानता है या नहीं, आपकी बात सुनता है या नहीं, आपके बारे में क्या सोचता है अथवा आपके लिए कितना उपयोगी है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी बात यह है कि हम सभी मनुष्य हैं। हमें जीवन को बनाए रखना है और इसलिए हमें बंधुत्व के साथ रहना है।

सरसंघचालक जी ने कहा, “भौतिक भिन्नताओं और हर प्रकार की विविधता के उपरांत हमारे भीतर कुछ ऐसा है, जो समान है। हम एक-दूसरे के हैं।”

उन्होंने कहा कि वह सिद्धांत, जो सबको जोड़ता है, सबको आत्मसात करता है, किसी प्रकार का विभाजन उत्पन्न नहीं करता, सभी के बीच संतुलन बनाए रखता है और मध्य मार्ग दिखाता है, वही धर्म है।

उन्होंने कहा कि “हम आजकल फादर्स डे, मदर्स डे आदि क्यों मनाते हैं? क्योंकि हम उनके प्रति अपने दायित्व को याद करते हैं। हमें पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व को भी याद रखना चाहिए।”

आपके कुछ भी खाने से पहले, दुनिया में खेती का होना ज़रूरी है। इसी वजह से आप खाना खा पाते हैं। अगर किसान खेती करना छोड़ दें, तो आप क्या खाएंगे? आपने जो कपड़े पहने हुए हैं, वे इसलिए हैं क्योंकि मिलें हैं, मज़दूर काम कर रहे हैं और कपास उगाने वाले किसान मौजूद हैं। हम हर चीज़ के लिए किसी न किसी दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए, हमें भी बदले में कुछ वापस देना चाहिए।

भारत का वैश्विक मिशन और उसकी नियति

भारत की वैश्विक भूमिका को रेखांकित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “मानव जीवन इस ज्ञान को सभी तक पहुँचाने और स्वयं उस ज्ञान को जीने के लिए मिला है – अपने मोक्ष के लिए और दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए। यही वह मिशन है, जिसे भारत को पूरा करना है। यही वह संदेश है, जिसे विश्व भर के भारतीयों को उपदेश देकर नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण से देना है। यही भारत की नियति है।”

विश्व भर में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की भूमिका पर कहा कि उन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए, लेकिन जन्मभूमि के मूल्यों के अनुरूप सतत जीवन जीना चाहिए। यही भारत की उनसे अपेक्षा है। “हम एकत्व से जुड़े हैं और विविधता से सुसज्जित हैं। विविधता प्राकृतिक है और एकता ही सत्य है। हम एकत्व की सजावट के रूप में विविधता का उत्सव मनाते हैं।”

रक्षाबंधन का संदेश—दायित्व और बंधन

सरसंघचालक जी ने कहा कि दूसरों के प्रति दायित्व को  स्वीकार करना व्यक्ति को मुक्ति की ओर ले जाता है। रक्षाबंधन में निहित बंधन का संदेश भी यही है।

डॉ. मोहन भागवत जी के संबोधन से पहले २०० धार्मिक नेताओं के ‘कॉल फॉर एक्शन’ प्रस्ताव को प्रस्तुत किया। इस अवसर पर ३० देशों के १८० धार्मिक नेताओं ने भविष्य के प्रति दायित्व स्वीकार करने के लिए पाँच सूत्रीय कार्य योजना की घोषणा की। ‘कॉल फॉर एक्शन’ (कार्य आह्वान) प्रस्ताव में यह संकल्प लिया गया कि किसी भी समुदाय की गरिमा यदि अपमान अथवा हिंसा के संकट में हो, तो उसकी गरिमा की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से खड़ा हुआ जाएगा। वैश्विक धार्मिक नेताओं ने धर्म के उपयोग के माध्यम से घृणा, अपमान, अमानवीयकरण अथवा हिंसा को उचित ठहराने को अस्वीकार किया।

वक्ताओं के संबोधन से पहले रक्षाबंधन उत्सव मनाया गया, जिसमें सभी ने एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकत्व की भावना का संदेश दिया।

इस आयोजन को सफल बनाने के लिए २५० संगठन एक साथ आए। इस वननेस सेलिब्रेशन (एकत्व उत्सव) में अमेरिका के ३९ राज्यों और ८५० अमेरिकी नगरों से लगभग ६,००० प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त २९ देशों से भी प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

 

 

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