राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने कहा कि आज हम सभी रक्षाबंधन का उत्सव मनाने को एकत्रित हुए हैं। यह सिर्फ धागा बांधने का पर्व नहीं है, धागा जब मंत्रों से अभिमंत्रित होता है, स्नेह और समर्पण जुड़ता है तो एक सामान्य सा दिखाई देने वाला धागा भी अत्यंत प्रभावशाली और परिणामकारी हो जाता है।
गोरखपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दक्षिण भाग द्वारा योगीराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित रक्षाबंधन उत्सव में सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने कहा कि आज हम सभी रक्षाबंधन का उत्सव मनाने को एकत्रित हुए हैं। यह सिर्फ धागा बांधने का पर्व नहीं है, धागा जब मंत्रों से अभिमंत्रित होता है, स्नेह और समर्पण जुड़ता है तो एक सामान्य सा दिखाई देने वाला धागा भी अत्यंत प्रभावशाली और परिणामकारी हो जाता है। रक्षाबंधन का पर्व सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला पर्व है। रक्षाबंधन का पर्व राष्ट्र की रक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेकर हमें अपने जीवन में इस हेतु सक्रिय बनना पड़ेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई भी स्वयंसेवक जब प्रतिज्ञा धारण करता है तो कहता है – ‘मैं इस पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू समाज का संरक्षण कर हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक प्रतिज्ञाबद्ध होकर गत 100 वर्षों से कार्य कर रहा है।
उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म का प्रतीक है यह परम पवित्र भगवा ध्वज। जिसका निर्माण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं किया है, बल्कि यह हजारों वर्षों से इस देश की संस्कृति, जीवन मूल्य, परम्परा, सभी गतिविधियों का केंद्र बिंदु रहा है। “धर्मो रक्षति रक्षितः” के उदाहरण से बताया कि अगर हम धर्म की रक्षा करते हैं तो धर्म हमारी रक्षा करता है। जो अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता वो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता। अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी है तो उसको मानने वालों, उसके प्रति श्रद्धा रखने वाले समाज को भी शक्तिशाली होना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि हमारे घर में सभी सुविधाएं हों, बड़ा मकान हो, वाहन हो और नौकर-चाकर हों, लेकिन परिवार के किसी एक सदस्य को बीमारी हो जाए तो घर का सुख-चैन समाप्त हो जाता है। हमारा सुख अकेले-अकेले संभव नहीं है। हमारा सुख परिवार के सुख से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार को अपनी भूमि और घर छोड़कर पलायन करना पड़े तो क्या वह परिवार वास्तव में सुखी रह सकता है? इसी प्रकार यदि राष्ट्र की स्थिति ठीक नहीं है तो केवल व्यक्तिगत समृद्धि के आधार पर हम सुखी नहीं रह सकते। बांग्लादेश में कभी लाखों-करोड़ों हिन्दू रहते थे, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर वहां बड़ी संख्या में लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी बहुत बड़े हाथी को लोहे की जंजीर से बांधा जाए और उस जंजीर की एक कड़ी कमजोर हो, तो सबसे पहले वही कमजोर कड़ी टूटेगी। अंग्रेजी में कहा जाता है – ‘द स्ट्रेंथ ऑफ द चेन इज़ द स्ट्रेंथ ऑफ इट्स वीकेस्ट लिंक’। अर्थात किसी भी श्रृंखला की ताकत उसकी सबसे कमजोर कड़ी के बराबर होती है। इसलिए समाज की कमजोर कड़ी को मजबूत करना आवश्यक है। जब समाज की प्रत्येक कड़ी मजबूत होगी, तभी संपूर्ण हिन्दू समाज शक्तिशाली बनेगा।।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथि सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी, कार्यक्रम अध्यक्ष कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा जी, प्रांत संघचालक डॉ. महेंद्र अग्रवाल जी, भाग संघचालक ओम जालान जी ने दीप प्रज्ज्वलन कर व भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन कर किया। अतिथियों ने परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर धर्म, संस्कृति व देश की रक्षा का संकल्प लिया।
कार्यक्रम अध्यक्ष कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा जी ने राजा बलि के उदाहरण के साथ बताया कि यह पर्व त्याग और बलिदान के साथ अपनत्व की रक्षा का पर्व है। रक्षाबंधन का पर्व रक्षा के संकल्प का पर्व है। यह रक्षा सिर्फ शरीर की रक्षा की नहीं, बल्कि इसमें प्रकृति, संस्कृति और परंपरा आदि की रक्षा करना भी निहित है। यह पर्व परस्पर सम्मान, परस्पर रक्षा, परस्पर प्रेम व परस्पर विश्वास का प्रतीक है। आज हम सबने भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांध कर माँ भारती और सनातन संस्कृति की रक्षा का प्रण लिया है और इसके लिए हमें संकल्पित होना होगा।

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