वर्ष प्रतिपदा अर्थात हिंदू नव वर्ष

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राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस हिंदू नव वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है| इस दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरूआत होती है| इसी दिन से मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करने वाले चैत्र नवरात्रि के व्रत की शुरुआत होती है।

राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस हिंदू नव वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है| इस दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरूआत होती है| इसी दिन से मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करने वाले चैत्र नवरात्रि के व्रत की शुरुआत होती है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र माह की इसी तिथि के दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और इसी दिन पहली बार सूर्य देव की पृथ्वी पर उदय हुआ था। इसी तिथि के दिन राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत का आरंभ किया था जिसे हिंदू नवसंवत कहा जाता है। इस तिथि को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, गोवा और केरल में संवत्सर पड़वो, कर्नाटक में युगाड़ी, आंध्रप्रदेश और तेलांगना में उगाड़ी, कश्मीर में नवरेह, मणिपुर में सजिबु नोंगमा पानबा के नाम से मनाया जाता है।

‎यह नववर्ष किसी जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं है अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है। यह पर्व विशुद्ध रुप से भौगोलिक पर्व है। क्योकि प्राकृतिक दृष्टि से भी वृक्ष वनस्पति फूल पत्तियों में भी नयापन दिखाई देता है। वृक्षों में नई-नई कोपलें आती हैं। वसंत ऋतु का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है। मनुष्य के शरीर में नया रक्त बनता है। हर जगह परिवर्तन एवं नयापन दिखाई पडता है। रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है।

1 जनवरी में नया जैसा कुछ नहीं होता किंतु अभी चैत्र माह में देखिए नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता है। यह नवीनता हमें नई उर्जा प्रदान करती है। नव वर्ष को शास्त्रीय भाषा में नवसंवत्सर (संवत्सरेष्टि) कहते हैं। इस समय सूर्य मेष राशि से गुजरता है इसलिए इसे "मेष संक्रांति" भी कहते हैं।

‎प्राचीन काल में नव-वर्ष को वर्ष के सबसे बड़े उत्सव के रूप में मनाते थे। यह रीत आजकल भी दिखाई देती है जैसे महाराष्ट्र में गुडीपाडवा के रुप में मनाया जाता है तथा बंगाल में पइला पहला वैशाख और गुजरात आदि अनेक प्रांतों में इसके विभिन्न रूप हैं।

नववर्ष का प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व:

आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था। इस कारण यह "मानव सृष्टि संवत्" है।

इसी दिन परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमशः ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था। इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत् भी कहते हैं।

 

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