हिन्दू शोभायात्राओं में हमले क्यों?

डॉ. संजय वर्मा

इस्लामिक कट्टरपंथियों एवं उनके पैरोकार कम्युनिस्ट, शहरी नक्सलियों को समझना होगा कि हिन्दू सनातन संस्कृति का मूल भाव सहिष्णुता है। प्रत्येक सनातनी इस भाव की उपासना करता है किंतु समय आने पर वह रामचरित मानस की चौपाई के अंश, 'भय बिनु होई न प्रीति' का मर्म भी समझता है।

हिन्दू सनातन संस्कृति के प्रतीक तीज-त्यौहारों के अवसर पर निकलने वाली शोभायात्राओं पर पिछले कुछ वर्षों में हमलों में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई है। ऐसा नही है कि ये हमले हाल के वर्षों में ही प्रारंभ हुए हैं अपितु इनका इतिहास सदियों पुराना है। ज्यादातर हमले श्रीराम नवमीं की शोभायात्रा में हुए हैं और हाल के वर्षों में हनुमान जन्मोत्सव भी इन हमलों में जुड़ गया है।

कम्युनिस्ट और इस्लामिक कट्टरपंथियों के पैरोकार शहरी नक्सली एवं सेक्युलर मीडिया में बैठे कुछ लेखक, पत्रकार इसके लिए हिंदुओं को ही दोषी ठहरा रहे हैं। रामनवमी शोभायात्रा को क्यों निशाना बनाया जाता है इसको समझने के लिए श्रीराम का भारतीय सनातन संस्कृति में महत्व एवं उसके खिलाफ कम्युनिस्ट, शहरी नक्सली एवं इस्लामिक उग्रवादियों के अलिखित गठजोड़ को समझना आवश्यक है।

श्रीराम भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा हैं। सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक है। यही इस्लामिक कट्टरपंथियों एवं कम्यूंनिस्टों की सबसे बड़ी समस्या है।

इस्लामिक कट्टरपंथ एवं कम्युनिस्ट उग्रवाद के अलिखित गठजोड़ के असली चेहरे और एजेंडे को समझना आवश्यक है। इनका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं की आस्था पर आघात कर सनातन संस्कृति, परंपरा को खत्म करना है। साथ ही भारत को विदेशी ताकतों के इशारे पर अस्थिर करना। इसके लिए शहरी नक्सली के रूप में विद्यमान कुछ पत्रकार, वकील, शिक्षकों द्वारा भारतीय संस्कृति पर तीज-त्योहार के बहाने हिंदुओं की आस्था पर चोट करना, उसे दकियानूसी और रूढ़िवादी बताकर नई पीढ़ी को गुमराह करना एवं इस्लामिक कट्टरपंथियों को बढ़ावा देना है।

इस्लामिक और वामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी विचार हैं जिनका स्पष्ट और घोषित उद्देश्य पूरी दुनिया में अपने विचार की स्थापना किसी हद तक जा कर करना है और इन गतिविधियों को दोनों समूह जिहाद और क्रांति का नाम देते हैं। मार्क्सवादी-वामपंथी अपने आयातित विचारों को शिक्षा एवं पाठ्यक्रम के माध्यम से बच्चों में जहर घोलते हैं जो आगे चलकर 'भारत तेरे टुकड़े होंगें...' के नारे के रूप में परिणित होते हैं।

श्रीराम सदैव से भारतीयों की आस्था एवं संस्कृति के प्रतीक रहे हैं। इसलिए श्रीराम जन्मभूमि एवं रामलला की रक्षा हेतु करोड़ों भारतीयों ने लगभग पिछले 500 वर्षों से बलिदान दिया है जिसमें राजा-महाराजा, सिपाही, आम नागरिक एवं साधु-सन्यासी शामिल। 500 वर्ष पूर्व जिहादियों ने रामलला का मंदिर तोड़कर भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को समाप्त करने का प्रयास किया था।

शोभायात्राओं में हमले करने वाले और उसके पीछे की योजना जगजाहिर है। वामपंथी विचारक एवं सेक्युलर मीडिया का एक वर्ग यह विमर्श गढ़ने और प्रचारित करने में लगा है कि इस हिंसा के लिए हिंदू ही जिम्मेदार है। ऐसा विमर्श गढ़ा जा रहा है कि रामनवमी एवं हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर भक्तों द्वारा भड़काऊ नारे और क्रियाकलाप से तात्कालिक हिंसा भड़कती है। यदि ऐसा है तो घरों, मस्जिदों की छतों पर पत्थर के ढेर और पेट्रोल बम आदि इतनी जल्दी कैसे पहुंच जाते हैं।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल को एक जनहित याचिका की सुनवाई में रामनवमी की हिंसा को प्रथम-दृष्टया सुनियोजित बताया है। पिछले कई वर्षों में अनेकों उदाहरण हैं जिसमें ऐसी घटनाओं को नियोजित करने के लिए मौलवियों को गिरफ्तार किया गया है। इस विमर्श के माध्यम से शहरी नक्सली हिंदू-मुस्लिम एकता को तार-तार करना चाहते हैं। डॉ भीमराव अम्बेडकर के अनुसार हिन्दू-मुस्लिम संबंधों में वैमनस्य के तीन कारण हैं जिनमें गौहत्या, मस्जिदों के बाहर भजन-संगीत एवं मतांतरण है। डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में लिखा है, "इस्लाम का भ्रातृत्व, सार्वभौमिक भ्रातृत्व का सिद्धांत नही है... मुसलमानों के लिए हिन्दू 'काफिर' है, और एक 'काफिर' सम्मान के योग्य नही है।"

इस्लामिक कट्टरपंथियों एवं उनके पैरोकार कम्युनिस्ट, शहरी नक्सलियों को समझना होगा कि हिन्दू सनातन संस्कृति का मूल भाव सहिष्णुता है। प्रत्येक सनातनी इस भाव की उपासना करता है किंतु समय आने पर वह रामचरित मानस की चौपाई के अंश, 'भय बिनु होई न प्रीति' का मर्म भी समझता है।

 

Related Posts you may like

इंद्रप्रस्थ संवाद - नवीन अंक