“भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट एवं और जागृत मानवता” - डॉ. मोहन भागवत जी

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कनाडा के सभी 10 प्रांतों से 175 मेजबान संगठनों के 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया।

टोरंटो, (कनाडा) 31 अगस्त,2026।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 31 अगस्त को कनाडा के टोरंटो में ‘हिंदू विश्व बंधु – एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ (हिंदू विश्व बंधु: मैत्री में विश्व को अपनाएँ) कार्यक्रम को संबोधित किया। यह कार्यक्रम कॉर्ड (सीएचओआरडी—कनाडियन हिंदूज़ फॉर आउटरीच रिलेशंस एंड डायलॉग) द्वारा आयोजित किया गया था। कनाडा के सभी 10 प्रांतों से 175 मेजबान संगठनों के 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया।

समागम को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत जी ने बिना किसी भेदभाव के दूसरों की सहायता करने की भारत की परंपरा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से भारत में बिना उत्पीड़न के भय के शांतिपूर्ण आश्रय पाया है।

उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के निवासी, जिनमें से अनेक शरणार्थी बन गए थे, समुद्र पार करके भारत आए। उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन था और उन्होंने शरण देने से इनकार कर दिया। उस समय जामनगर एक रियासत था। जामनगर के राजकुमार ने उन्हें बुलाया और कहा, ‘यहाँ आइए, यहाँ बस जाइए। जब तक आपका देश फिर से आपके लिए स्वतंत्र नहीं हो जाता और आप यहाँ से जाने के लिए स्वतंत्र नहीं होते, तब तक मैं आपकी रक्षा करूँगा।’ और यह चलता आ रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “कुछ वर्ष पहले जब मध्य-पूर्व में युद्ध हुआ और लोग वहाँ फँस गए थे, तब भारत के सैन्य विमान वहाँ गए और लोगों को बचाकर लाए। केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि सात देशों के नागरिकों को वहाँ से बचाया गया। जब भी विश्व में कहीं संकट आया और भारत से सहायता माँगी गई, भारत ने कभी मना नहीं किया। बल्कि बिना मदद के लिए पुकार किए भी वह सहायता करता है। यही परंपरा है। यही भारत का डीएनए (मूल स्वभाव) है।”

भारत की परंपरा—केवल विविधता में एकता नहीं, बल्कि एकता की विविधताएँ भी भारत की एकता की परंपरा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “हमारी भारत की परंपरा हमें केवल यूनिटी इन डायवर्सिटी (विविधता में एकता) ही नहीं बताती, बल्कि डायवर्सिटीज ऑफ यूनिटी (एकता की विविधताएँ) भी बताती है। सभी विविधताएँ एकता की अभिव्यक्ति हैं।”

उन्होंने कहा, “इसलिए हम, जिन्हें इस पृथ्वी पर कुछ वर्षों तक जीना है, ऊबना नहीं चाहिए। हमें इस विविधता की सेवा करनी है, इसे स्वीकार करना है, इसका सम्मान करना है, क्योंकि यह एकता की अभिव्यक्ति है। यह इसे सुंदर बनाती है। यह इसकी शोभा है। हम इसका उत्सव मनाते हैं। हम हमेशा एकता को देखते हैं।”

उन्होंने कहा, “भारत में अनेक जातियाँ, अनेक पंथ, अनेक भाषाएँ रही हैं। सब कुछ अनेक है। कुछ भी अकेला नहीं है। कुछ भी एकल नहीं है किन्तु यह सब एक ही है। हम यह नहीं कहते कि सभी एक हैं बल्कि हम कहते हैं कि सब एक ही है।”

भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट, अधिक मुक्त मानवता

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा, “जब भारत बड़ा बना—वह कभी सुपरपावर (विश्व महाशक्ति) नहीं बना। वह एक गौरवशाली देश बना। हाँ, कोई उस समय के भारत को महाशक्ति कह सकता है। किन्तु वह महाशक्ति  नहीं था। वह एक गौरवशाली देश था। जब भारत बड़ा बना, तब उसने विश्व की सेवा की।”

उन्होंने कहा, “अपने चरित्र के कारण वह विश्वगुरु बना, महाशक्ति नहीं। इसलिए भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट, अधिक मुक्त मानवता।”

उन्होंने कहा कि भारत ने यह कार्य बहुत पहले किया था, जब न सड़कें थीं, न नावें, न हवाई जहाज, न मोटर वाहन—केवल बैलगाड़ियाँ और घोड़े थे।

उन्होंने कहा, “हमारे पूर्वज मैक्सिको से साइबेरिया तक के क्षेत्रों में गए और उन्हें समस्त ज्ञान दिया। वे पैदल हिमालय पार करके चीन गए, साइबेरिया गए, मंगोलिया गए, छोटी नावों से गए। वे दक्षिण-पूर्व एशिया गए। उस समय की ज्ञात विश्व तक वे पहुँचे।”

उन्होंने कहा, “और उन्होंने क्या किया? उन्होंने किसी देश पर विजय प्राप्त नहीं की। उन्होंने किसी को धर्मांतरित नहीं किया। वे जहाँ भी गए, उन्होंने ज्ञान दिया, गणित दिया, ज्योतिष दिया, आयुर्वेद दिया और सभ्यतागत मूल्यों का प्रसार किया।”

भारत की विविधता और ‘हिंदू’ की व्यापक अवधारणा

भारत की विविधता के संदर्भ में सरसंघचालक जी ने कहा, “जब मैं हिंदू कहता हूँ, तो ‘हिंदू’ शब्द को किसी विशिष्ट भाषा, किसी विशिष्ट उपासना या किसी विशिष्ट जीवन-शैली के माध्यम से परिभाषित नहीं किया जा सकता। हिंदू सभी का सम्मान करते हैं। हिंदू सभी को स्वीकार करते हैं। उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं होती।”

उन्होंने कहा, “हम कहते हैं कि हमारी सभी प्रार्थनाएँ भारत कहलाने वाली भूमि से उत्पन्न हुई हैं, किन्तु वे कभी केवल भारत के लिए नहीं थीं। वे उस पूरे ब्रह्मांड के लिए थीं, जिसे हम जानते हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं आपको कोई नई बात नहीं बता रहा हूँ। मैं वही बता रहा हूँ, जो आप परंपरागत रूप से सीखते आए हैं, जिसे आप परंपरागत रूप से जपते और गाते आए हैं। किन्तु आप इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हिंदुओं को इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि विश्व को इन सभी बातों की आवश्यकता है।”

उन्होंने कहा, “हमें वह सृजित करना है, जिसकी विश्व को आवश्यकता है और फिर उसे देना है। किन्तु हम उसे कैसे दें? हम किसी पर दबाव नहीं डालते। हमारे पूर्वज हर देश में गए। उन्होंने कभी किसी पर कुछ थोपा नहीं। हम ऐसे नेता हैं, जो भीतर से नेतृत्व करते हैं और उदाहरण के द्वारा नेतृत्व करते हैं।”

हिंदू समाज की भूमिका—दिशा देना और उदाहरण प्रस्तुत करना

हिंदू समाज की भूमिका पर डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा, “हिंदू समाज दिशा प्रदान करता है। वह दिशा मूल्यों की है, एक विशेष ज्ञान की है—ऐसे ज्ञान की, जो अत्यंत प्रासंगिक और शाश्वत है।”

उन्होंने कहा, “हम एक हैं और उस आधार पर जीवन कैसे जीना है? हिंदू समाज को इसका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। भारत में भी यदि कोई व्यक्ति हिंदू समाज के बीच ऐसा आदर्श जीवन देखना चाहता है, तो उसे ऐसे जीवन के उदाहरण मिलेंगे। किन्तु हमें इसे और अधिक व्यापक अनुपात में करना होगा।”

उन्होंने कहा, “ताकि लोग देख सकें, राष्ट्र देख सकें और अपनी-अपनी विशिष्ट प्रवृत्ति तथा अपने-अपने आधार पर, इसे ध्यान में रखते हुए अपने जीवन का पुनर्निर्माण कर सकें।”

उन्होंने कहा, “सभी राष्ट्र फलें-फूलें, समृद्ध हों, सहयोग करें, मानव प्रगति और सृष्टि की प्रगति में योगदान दें। यही वह स्वप्न है, जो हिंदुओं के मन में है।”

उन्होंने कहा, “हमें स्वयं का विकास करना है। हमें एक फूल की तरह बनना है और अपनी सुगंध पूरे वातावरण में फैलानी है। इस प्रकार हम विकसित हों और मानवता के उद्देश्य के प्रति समर्पित तथा निष्ठावान बनें। यही हिंदू का जीवन है।”

भारत-कनाडा संबंधों में नई गति का स्वागत

कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी ने भारत और कनाडा के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों की सराहना की।

उन्होंने कहा, “कनाडा-भारत संबंधों में नए सिरे से गति पकड़ते देखना बहुत सुखद है। इसका प्रतिनिधित्व इस वर्ष के अंत में प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा की दूसरी यात्रा से भी होगा।”

वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश

ग्रेटर टोरंटो एरिया (जीटीए) के हिंदू सभा मंदिर के राजिंदर प्रसाद ने कहा, “डॉ. मोहन भागवत जी की यात्रा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश लेकर आई है। हमें अपनी संस्कृति के मूल्यों का संदेश विश्व तक पहुँचाना चाहिए। हम मोहन भागवत जी का स्वागत करते हैं।”

हिंदू-सिख साझा विरासत और सेवा की भावना

खालसा दीवान सोसाइटी और ऐतिहासिक रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे का प्रतिनिधित्व कर रहे, कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कश्मीर सिंह धालीवाल ने कहा कि आज टीयूएसएचए (द यूनाइटेड स्टेट्स एंड हिंदू एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका) की ओर से बोलना उनके लिए सौभाग्य की बात है।

उन्होंने कहा, “हिंदू और सिख अलग-अलग धर्मों और परंपराओं का पालन कर सकते हैं, किन्तु हम एक अत्यंत मूल्यवान चीज साझा करते हैं। हम भाषाएँ, भोजन, संगीत, पारिवारिक परंपराएँ, त्योहार, मूल्य और सबसे बढ़कर समुदाय तथा सेवा की भावना साझा करते हैं।”

उन्होंने कहा, “आज हिंदू और सिख समुदाय कनाडा के बहुसांस्कृतिक समाज में सबसे अधिक योगदान देने वाले समुदायों में सम्मिलित  हैं। हमें वास्तव में गर्व है कि हमारा जन्म विश्व के सबसे पुराने बहुसांस्कृतिक देश भारत में हुआ है और हम विश्व के सबसे युवा बहुसांस्कृतिक देश कनाडा में रह रहे हैं।”

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