अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल 2013 प्रस्ताव दो

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अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल 2013 प्रस्ताव दो: भू सीमाओं के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल 2013 प्रस्ताव दो: भू सीमाओं के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता

27-Oct-2013

    

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल , भारत की भू-सीमाओं की वर्तमान स्थिति तथा सीमावर्ती गाँवों के जनजीवन की परिस्थितियों की ओर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करना चाहता है। भारत की जमीनी सीमाएं आठ देशों के साथ मिलती हैं। यह खेद की बात है कि इन में से अधिकांश देशों के साथ भारत को सीमा विवाद का सामना करना पड़ रहा है।

सभी भू-सीमाओं पर आधारिक सुविधाओं का ढाँचा मजबूत करने की आवश्यकता को अ. भा. का. मं. रेखांकित करना चाहता है। विविध अध्ययनों से विदित हुआ है कि सीमाओं पर आधारिक सुविधाएँ पूरी तरह से अपर्याप्त हैं।

अ. भा. का. मं. खेदपूर्वक यह कहना चाहता है कि 4057 किलोमीटर लम्बी अति संवेदनशील भारत-तिब्बत सीमा ही सर्वाधिक उपेक्षित है। अनेक क्षेत्रों में पक्की सड़क के सीमा रेखा से 50-60 कि. मी. पहले ही समाप्त हो जाने के कारण सीमावर्ती गाँवों के लोगों को अत्यधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। यातायात के साधन अल्प हैं , अनेक गाँवों में सप्ताह में एक ही बार बस सुविधा उपलब्ध है। अनेक विद्यालयों के लिए पर्याप्त भवन नहीं है , अस्पतालों का अस्तित्व ही नहीं है ; बिजली है ही नहीं या अनियमित है तथा दूर संचार की सुविधाएँ भी कई गाँवों में नहीं है। बाजार इतने दूर हैं कि लोगों को सामान्य खरीददारी के लिये सीमा लाँघ कर जाने को विवश होना पड़ता है।

अ. भा. का. मं. इस बात पर बल देना चाहता है कि सीमाओं की सुरक्षा करने वाले जवानों की तरह ही सीमावर्ती गाँवों में रहनेवाला समाज भी सीमाओं का रक्षक है। सीमावर्ती गाँवों की दुर्दशा पर सरकारों की उदासीनता सीमाओं की सुरक्षा के लिए घातक है। इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण रोजगार के घटते अवसर और जीवनयापन की समस्याओं के चलते पलायन हो रहा है। चीन द्वारा इन लोगों के चारागाह क्षेत्र पर कब्जों से इनकी कठिनाईयाँ और अधिक बढ़ रही हैं। 

भारत-पाक सीमा तथा नियंत्रण रेखा के निकट बसने वाले गाँवों के लोगों को पाकिस्तान सेना की लगातार हो रही गोलीबारी के कारण अपने प्राणों पर सतत खतरे का सामना करना पड़ रहा है। सम्पत्ति और पशुधन की हानि और यहाँ तक कि प्राणों की हानि भी उनके दैनंदिन जीवन का भाग बन गया है। उन्हें प्रशासन से क्षतिपूर्ति या तो मिलती ही नहीं या बहुत अपर्याप्त मिलती है। अनेक स्थानों पर सीमावर्ती गाँवों के लोगों को वर्षों तक अपने घर छोड़कर शिविरों में रहना पड़ता है। जो गाँवों में रहते हैं उनको भी कई गंभीर समस्याएँ हैं- यथा सीमा पर तारबन्दी तथा सीमा सुरक्षा हेतु बिछाई गई बारूदी सुरंगों के कारण उनको अपने खेतों पर आना-जाना भी बाधित हो गया है।

भारत-नेपाल , भारत-म्यांमार और भारत-बांगलादेश की सीमाएँ , अवैध व्यापार , जाली नोट , अवैध हथियारों की तस्करी तथा मानव व मादक पदार्थों की तस्करी आदि गतिविधियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बन गयी हैं। आतंकवादी तथा राष्ट्रविरोधी शक्तियों द्वारा इन सीमाओं का उपयोग पड़ोसी देशों में भागकर छिपने के लिये हो रहा है। भारत-बांगलादेश सीमा अभी भी सछिद्र होने के कारण वहाँ घुसपैठ तथा गौवंश सहित पशुधन की तस्करी बड़ी मात्रा में निरन्तर हो रही है। भारत और नेपाल सीमा के दोनों ओर अवैध मदरसे , मस्जिदों एवं बसावटों का तीव्र गति से हो रहा विस्तार दोनों देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा बन गया है।

वर्तमान स्थिति को देखते हुए , अ. भा. का. मं. भारत सरकार से माँग करता है कि

1.         सीमाओं पर सड़कें , रेलतंत्र , बिजली-पानी , विद्यालय , अस्पताल जैसी आधारिक सुविधाएँ निर्माण करने को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करे।

2.         सीमावर्ती क्षेत्रों में ग्राम सुरक्षा समितियों का गठन कर , उन्हें प्रशिक्षण एवं उचित प्रोत्साहन देकर सीमा सुरक्षा तथा प्रबन्धन में उनकी सहभागिता सुनिश्चित करनी चाहिए।

3.         सभी सीमाओं की विविध प्रकार की गतिविधियों के प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र सीमा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया जाये।

4.         भारत-बांगलादेश सीमा की तारबंदी को पूर्ण किया जाये तथा अन्य सीमाओं पर सुरक्षा बलों के प्रभावी नियोजन द्वारा सीमा सुरक्षा को मजबूत किया जाये।

5.         तारबन्दी एवं बारूदी सुरंगों के बिछाये जाने के परिणामस्वरूप जिनकी भूमि उनकी पहुँच से बाहर हो गई है , उनको समुचित मुआवजा दिया जाये।  

6.         सीमा क्षेत्र में परम्परागत धार्मिक आस्था एवं अन्य पर्यटन की संभावना वाले स्थानों को विकसित कर सीमा-पर्यटन को प्रोत्साहन दिया जाय जिससे न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग लाभान्वित होंगे अपितु देशवासियों का सीमाओं से भावनात्मक लगाव भी बढ़ेगा।

7.         सीमा सुरक्षा में लगे विविध अर्धसैनिक बलों तथा सेना के मध्य परिचालन समन्वय का प्रभावी तंत्र विकसित किया जावे।

8.         सुरक्षाबलों तथा सीमावर्ती लोगों के बीच संवाद व समन्वय का तंत्र विकसित किया जावे।

 

  अ. भा. का. मं. का मत है कि सरकार की पराभूत मानसिकता ही सबसे बड़ी चुनौती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारा नेतृत्व अपनी भूमि के हर इंच की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने में विफल रहा है। अ. भा. का. मं. सरकार तथा उसके अधिकारियों से यह माँग करता है कि वे इस तोतारटन्त को बंद करें कि ” अपनी सीमाएँ पूरी तरह से निर्धारित नहीं है “ । यह असत्य है। भारत की सीमाएँ सुस्पष्ट हैं। यह दुःख का विषय है कि इस ऐतिहासिक सत्य को दृढ़तापूर्वक कहने का साहस अपने नेतृत्व में नहीं है।

अ. भा. का. मं. देश की जनता को आवाहन करता है कि उन्हें यह नहीं मान लेना चाहिए कि सीमा सुरक्षा केवल सरकार तथा सुरक्षा बलों का ही दायित्व है अपितु देशभक्त जनता का कर्तव्य है कि वे अपनी सीमाओं के बारे में सजग रहते हुए उनकी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। 

 

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