राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा भारत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। इस दौरान देश ने समृद्धि, गुलामी, गरीबी और स्वतंत्रता जैसे अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली, वह है धर्म। भारत की संस्कृति का मूल तत्व धर्म है, जो समाज को जोड़ने और मानवता को दिशा देने का कार्य करता है।
नागपुर, 30 जून 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने इतवारी स्थित अजितनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर में दर्शन किए तथा मंदिर के शताब्दी महोत्सव के अवसर पर आयोजित समारोह में संबोधित किया। कार्यक्रम से पूर्व उन्होंने पूज्य तीर्थंकरों एवं दादा गुरुदेव के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
शताब्दी महोत्सव समारोह में सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत केवल आर्थिक या सामरिक शक्ति बनने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को धर्म, अध्यात्म और मानवता का मार्ग दिखाने के लिए बना है। विकसित और समृद्ध भारत का निर्माण निश्चित रूप से होगा, लेकिन विश्व भारत को धर्म का संदेश देने वाले राष्ट्र के रूप में ही पहचानेगा।
उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। इस दौरान देश ने समृद्धि, गुलामी, गरीबी और स्वतंत्रता जैसे अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली, वह है धर्म। भारत की संस्कृति का मूल तत्व धर्म है, जो समाज को जोड़ने और मानवता को दिशा देने का कार्य करता है। भारत में उपासना की अनेक पद्धतियां हैं, लेकिन सभी का उद्देश्य मनुष्य के चित्त को निर्मल बनाना, सत्य का साक्षात्कार कराना और करुणा का विकास करना है। जैन दर्शन के ‘अनेकांत’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सत्य को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करना चाहिए। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन सह-अस्तित्व और संवाद ही भारतीय संस्कृति की पहचान है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य भौतिक जीवन जीता है, इसलिए अर्थ और काम आवश्यक हैं। लेकिन उनका संचालन धर्म के अनुशासन में होना चाहिए। मंदिर, गुरुद्वारे, विहार और अन्य धर्मस्थल समाज के ऐसे केंद्र हैं, जहां व्यक्ति सांसारिक जीवन के विकारों से मुक्त होकर मानसिक शुद्धि और नई ऊर्जा प्राप्त करता है। धर्मस्थलों का उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण और समाज में बंधुत्व की भावना विकसित करना भी है। कर्म का सिद्धांत सभी भारतीय परंपराओं का मूल है। जैसा कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा। भगवान भी कर्मफल से अछूते नहीं रहे। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्य, करुणा, संयम और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए समाज के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। परिवार और समाज में मतभेद आते हैं, लेकिन उन्हें संवाद, समझदारी और धैर्य से सुलझाना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य समाज को जोड़ना और मानवता की सेवा करना है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि छोटे या बड़े किसी भी धर्मस्थल का महत्व उसकी इमारत से नहीं, बल्कि वहां से मिलने वाली प्रेरणा से होता है। ऐसे केंद्र समाज में अहिंसा, अनेकांत, संयम और बंधुत्व की भावना को सशक्त बनाते हैं। उन्होंने मंदिर समिति और समाज के सभी लोगों को इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए कहा कि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय संस्कृति और धर्म के मूल्यों से जोड़ती रहेगी।

IVSK




