अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय (ARKS) में सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद (ICOM) द्वारा निर्धारित वैश्विक विषय (थीम) “एक विभाजित विश्व को जोड़ते संग्रहालय” पर प्रबुद्ध इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, प्रबंधकों और कला संरक्षकों ने विचार साझा किए।
अयोध्या, १८ मई २०२६। अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस २०२६ के अवसर पर आज निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय (ARKS) में सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद (ICOM) द्वारा निर्धारित वैश्विक विषय (थीम) “एक विभाजित विश्व को जोड़ते संग्रहालय” पर प्रबुद्ध इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, प्रबंधकों और कला संरक्षकों ने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं उद्घाटनकर्ता प्रो. हिमांशु शेखर सिंह (डीन, डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय), डॉ संजीव कुमार सिंह (निदेशक अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय) एवं अन्य सम्मानीय विशिष्ट अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर अतिथियों का अंगवस्त्र भेंट कर अभिनंदन किया गया। इसके उपरांत सुमधुर जी ने मधुर वाणी में मंगलाचरण प्रस्तुत किया। मंच संचालन संग्रहालय की सहायक संग्रहालय अध्यक्ष (असिस्टेंट क्यूरेटर) ऋचा रानी ने किया।
विशेषज्ञों का वैचारिक समागम –
डॉ. संजीव कुमार सिंह (निदेशक, अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय) ने इस वर्ष की थीम की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भगवान श्री राम की कथा वैश्विक स्तर पर समाज को जोड़ने का कार्य करती है। साथ ही संग्रहालय की अत्याधुनिक २० दीर्घाओं (Galleries) की महत्ता और उनके क्रमिक विकास के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
प्रो. हिमांशु शेखर सिंह (डीन एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रबंधन विभाग, डॉ. रा.म.लो. अवध विवि) ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए तकनीकी और ‘टेक-सैवी’ (Tech-savvy) दुनिया में संग्रहालयों की अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित किया।
मयंक चौहान (शोधार्थी, पुरातत्व विभाग, गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय) ने उन प्राचीन साहित्यिक स्रोतों और साक्ष्यों को प्रस्तुत किया जो वैश्विक स्तर पर भगवान राम की अनमोल विरासत और उनके प्रभाव को प्रमाणित करते हैं।
राज्यवर्धन (सलाहकार, अयोध्या विकास प्राधिकरण) ने जीवन और समाज में ‘संग्रह’ के महत्व पर जोर देते हुए सभी से ‘संग्रह प्रेमी’ बनने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अब समय बदल चुका है और हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को कोई भी भारत से बाहर नहीं ले जा सकता।
डॉ. आनंद कुमार दुबे (विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग) ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा और इस वर्ष के विषय (थीम) के ऐतिहासिक अंतर्संबंधों को सरल शब्दों में समझाया।
डॉ. सत्येंद्र कुमार (संरक्षणविद्, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली – IGNCA) ने बताया कि ऐतिहासिक वस्तुओं पर किया जाने वाला संरक्षण कार्य (Conservation Effect) किस प्रकार हमारी अमूल्य विरासत को लंबी आयु प्रदान करता है।

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