गुरु गोविन्द सिंह जी के छोटे साहिबजादो के बलिदान को समर्पित वीर बाल दिवस

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सरहिंद के नवाब वजीर खान ने गुरु साहिब के दोनों बेटों बाबा जोरावर सिंह जिनकी उम्र 9 वर्ष और बाबा फतेह सिंह जिनकी उम्र 6 वर्ष थी, को इस्लाम स्वीकार करने को कहा। किन्तु दोनों ही वीर सपूतों ने इससे इंकार कर दिया और कहा की, “हम इस्लाम स्वीकार नहीं करेंगे। संसार की कोई शक्ति हमें अपने धर्म से नहीं डिगा सकती। हमारा निश्चय अटल है। हमें अपना धर्म प्राणों से भी अधिक प्यारा है। हम उसे अपने अंतिम साँस तक भी नहीं छोड़ेंगे।"

सिखपंथ के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों छोटे बेटों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह के बलिदान को भारत में अब हर वर्ष 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाया जाएगा। दोनों साहिबजादो की शहादत को याद करने और अन्याय, अत्याचार एवं धार्मिक मतान्तरण के विरुद्ध उनके सर्वोच्च बलिदान से भारतीय युवाओं एवं बालकों को प्रेरणा प्राप्त हो, इस हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रत्येक वर्ष 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। किंतु लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि बाल मन को प्रेरित एवं आंदोलित कर राष्ट्र निर्माण की ओर अग्रसर करने की आवश्यकता है। युवा शक्ति को सही दिशा देने की जरुरत है। वैसे तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, परंतु बालकों, युवाओं को प्रेरित एवं आंदोलित करने की मूल भावना की कमी को देश लंबे समय से महसूस कर रहा था। बुद्धिजीवियों और आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इतिहास लेखन में जो छल कपट किया गया उसे सही करने और भारतीय जनमानस को सच बताने की आवश्यकता है। विद्वानों का मत है कि बड़ी चालाकी से आतताइयों और अत्याचारियों के प्रति गौरव की भावना को जनमानस में पैदा किया गया। जबकि राष्ट्र के लिए सर्वस्व निछावर करने वाले वीर सपूतों को जानबूझकर गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया। गुरु गोविंद सिंह जी के चारों बेटों और माता गुजरी देवी की शहादत को इतिहास के पन्नों से हटाकर जो ऐतिहासिक भूल की गई उसे भारत सरकार द्वारा सही करने का प्रयास किया गया है।

साहिबजादो की शहादत की ऐतिहासिक घटना एक और मार्मिक है तो दूसरी ओर प्रेरणादायक है। इतिहास के पन्नों में इस घटना को देखें तो वर्ष 1705 के दिसंबर महीने में मुगल सेना ने 20 दिसंबर को अचानक आनंदपुर साहिब किले पर हमला कर दिया। गुरु गोविंद सिंह जी इस हमले का जवाब देना चाहते थे, किंतु अचानक हुए हमले से उनके सिपहसलारों ने किले से निकलने में ही भलाई समझी। गुरु गोविंद सिंह जी ने पुरे जत्थे की बात मानकर परिवार समेत आनंदपुर किला छोड़ दिया। सरसा नदी में पानी का बहाव बहुत तेज था जिस कारण नदी पार करते समय गुरु गोविंद सिंह जी का परिवार जिसमें चार बेटे और उनकी माता गुजरी देवी बिछड़ गए। गुरु गोविंद सिंह जी के साथ दो बड़े साहिबजादों बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह चमकौर पहुंच गए। किंतु उनकी माता गुजरी देवी और दोनों छोटे साहिबजादो बाबा जोरावर सिंह एवं बाबा फतेह सिंह बिछड़ गए। माता और दोनों छोटे बेटों के साथ गुरु साहिब का सेवक रहा गंगू भी था।

सेवक गंगू माता गुजरी और उनके दोनों छोटे बेटों को अपने घर ले गया। कहा जाता है कि माता गुजरी के पास सोने के सिक्के देखकर गंगू के मन में लालच आ गया और उसने मुगलों से इनाम पाने की चाहत में मुगल कोतवाल को माता गुजरी और दोनों साहिबजादों की सूचना दे दी। वे सभी गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें सरहिंद के नवाब वजीर खान के सामने पेश किया गया। क्रूर व अत्याचारी वजीर खान ने गुरु साहिब के दोनों बेटों बाबा जोरावर सिंह जिनकी उम्र 9 वर्ष और बाबा फतेह सिंह जिनकी उम्र 6 वर्ष थी, को इस्लाम स्वीकार करने को कहा। किन्तु दोनों ही वीर सपूतों ने इससे इंकार कर दिया और कहा की, “हम इस्लाम स्वीकार नहीं करेंगे। संसार की कोई शक्ति हमें अपने धर्म से नहीं डिगा सकती। हमारा निश्चय अटल है। हमें अपना धर्म प्राणों से भी अधिक प्यारा है। हम उसे अपने अंतिम साँस तक भी नहीं छोड़ेंगे।"

शहादत से एक दिन पहले दोनों साहिबजादो को दादी गुजरी के पास कैद खाने भेज दिया गया। दादी ने दोनों साहिबजादो की निर्भीकता और साहस से प्रसन्न हो कर कहा, “बच्चों तुमने अपने पिता की लाज रख ली।“

धर्म बदलने से इनकार करने पर वजीर खान ने दोनों साहिबजादो को जिंदा दीवार में चुनवा देने का आदेश दिया। जब उन्हें दीवार चुनवाया जा रहा था उसी दौरान बड़े भाई जोरावर सिंह ने छोटे भाई फतेह सिंह की ओर देखा और उनकी आंखों में आंसू आ गए। यह देख 6 वर्षीय बाबा फतेह सिंह ने कहा, " क्यों वीर जी आपकी आंखों में आंसू? क्या आप बलिदान से डर रहे हो?"

बड़े भाई जोरावर ने फतेह की ओर देखा फिर दोनों भाई खिलखिला कर हंस पड़े।

जोरावर – “फतेह सिंह तू बड़ा भोला है। मैं मौत से नहीं डरता बल्कि मौत मुझसे डरती है। इसी कारण तो वह पहले तेरी ओर बढ़ रही है। मुझे दुख केवल इस बात का है कि तू मेरे बाद संसार में आया और मुझसे पहले संसार से विदा हो रहा है। तुझे बलिदान होने का अवसर पहले मिल रहा है।“

वजीर खान 26 दिसंबर 1705 को गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों छोटे साहिबजादो को जिंदा दीवार में चुनवा दिया। वही गुरु गोविंद सिंह जी की माता गुजरी देवी को सरहिंद के किले से नीचे फेंक कर उनकी हत्या कर दी।

गुरु गोविन्द सिंह जी के परिवार की इस महान एवं अविस्मरणीय बलिदान को इतिहास की सबसे बड़ी शहादत माना जाता है। क्रूरता, अन्याय और अत्याचार के आगे बिना झुके तन कर खड़ा रहने और अपने प्राणों की आहुति देने की यह प्रेरणास्पद एवं अविस्मरणीय घटना इतिहास में एक मील का पत्थर बन गई।

सिख धर्मावलंबी और अन्य श्रद्धावान लोग हर वर्ष सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 20 दिसंबर से 27 दिसंबर तक शहीदी सप्ताह मनाते हैं। इस ऐतिहासिक घटना से बालकों और युवाओं को प्रेरणा देने हेतु 26 दिसंबर को वीर बल दिवस के रूप में मनाने का भारत सरकार एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्णय एक ऐतिहासिक कदम है जो देशवासियों को न सिर्फ प्रेरित करेगा बल्कि इस महान शहादत को इतिहास के पन्नों में पुनः सुनहरे अक्षरों में अंकित करेगा।

 

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