परवरिश: बच्चों से बनाए मधुर संबंध

IVSK

परवरिश आसान चीज नहीं है यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। अपने बच्चों को संस्कार दें और उन्हें अनुशासन का पाठ पढ़ा सकें इसके लिए आप तमाम तरह के उपाय करती है। बच्चे समय पर सारे काम कर पाए, अपनी हर काम को आप की मदद से ही सही, पर नियम से पूरा करें आप अपने बच्चों को लेकर ऐसा ही सोचते होंगे।

परवरिश आसान चीज नहीं है यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। अपने बच्चों को संस्कार दें और उन्हें अनुशासन का पाठ पढ़ा सकें इसके लिए आप तमाम तरह के उपाय करती है। बच्चे समय पर सारे काम कर पाए, अपनी हर काम को आप की मदद से ही सही, पर नियम से पूरा करें आप अपने बच्चों को लेकर ऐसा ही सोचते होंगे। लेकिन यदि यह कहे कि बच्चों को अनुशासित रखना इन दिनों एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है तो गलत नहीं होगा। दरअसल बच्चे आज जिस तरह से मोबाइल और गजट के प्रभाव में है उन्हें उचित परवरिश देना अक्सर कठिन प्रतीत होता है।

बाल मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों को अनुशासन सिखाने से पहले स्वयं से सवाल पूछे कि आप खुद नियमों का कितना पालन करती हैं? क्या आप बच्चे के प्रति मधुर रवैया रखती हैं? जानकार मानते हैं कि आज बच्चों को लेकर अभिभावकों में एक अजीब सी दौड़ है। हर कोई दबाव में है कि कैसे उनकी नौकरी भी बेहतर चले और बच्चा भी बेहतर करता हो। लेकिन यह कैसे संभव है? यह अभिभावकों को नहीं पता होता है। इसलिए सभी एक ही ढर्रे पर चलते हैं। ज्यादातर माता-पिता वही तरीका अपनाते हैं जो उनके माता-पिता ने अपनाया था। जैसे कि डाट देना, गलत भाषा या गालियों अथवा धमकी भरी भाषा का प्रयोग करना या फिर हिंसक तरीका अपनाना।

अब खुद चेक करें कि अनुशासन में रखने के लिए बच्चों के साथ आप भी इन तरीकों का उपयोग तो नहीं करती! यदि हाँ, तो आपको इस पर गंभीरता से मंथन करना होगा। अनुशासन सिखाने की खातिर माता-पिता का असंगत व्यवहार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है।

ना करें यह गलतियां

बच्चों के प्रति अधिक नकारात्मक ना हो। उन्हें यकीन दिलाएं कि आपके लिए वह कितने खास है। अनुशासन उन्हें और खास बना सकता है।

अनुशासन सिखाने का सबसे बेहतर तरीका है आप खुद नियमों का पालन करें।

अधिक कठिन नियम ना बनाएं। ऐसे नियम बनाए जो व्यावहारिक हो जैसे साथ बैठकर खाना, अपना बिस्तर खुद लगाना, स्कूल बैग खुद लगाना आदि।

हर छोटी बात / गलती पर डांटते रहने के बजाय उसका टास्क पूरा होने या कुछ नया करने पर उन्हें पुरस्कार दें। उन्हें बताएं कि वह अच्छा प्रगति कर रहे हैं।

अपनी कहते रहने के बजाय बच्चों की बात, उनकी राय को भी सुनने की आदत डालें। जाने कि वे आप के नियमों पर क्या राय रखते हैं, क्या इसमें और सुधार किया जा सकता है?

झुंझलाहट या गुस्से में आकर कोई बात ना करें। बच्चों का उत्साह कम होगा और संभव है कि वह आपकी बात ना माने।

छोटी उम्र से ही बड़ी बातें सिखा सकती हैं जैसे बड़ों का सम्मान करना, बिना आज्ञा के कोई चीज ना लेना या छूना आदि।

धैर्य है जरूरी

बच्चा क्यों चिल्लाता है, नियमों का पालन नहीं करता है तो क्या यह समझने का प्रयास किया है? अधिक अनुशासन और सख्त नियम परवरिश के क्रम में आम बात है पर यही बन रही है बड़ी मुसीबत। कड़े नियमों का पालन कराने में बच्चा घुटन महसूस कर सकता है। फिर एक दिन आपकी बात को अनसुनी करने लगता है। इसलिए धैर्य रखें। बच्चों को समझें, उन्हें सुने, समय दें। अनुशासन अच्छा है लेकिन यह केवल शासन न बन जाए इसका ध्यान रखें।

 

Related Posts you may like

इंद्रप्रस्थ संवाद - नवीन अंक