पॉजिटिव पेरेंटिंग का अर्थ है बच्चे का सही तरह से लालन-पालन। माता-पिता सकारात्मक विचारों से बच्चे में प्रेमपूर्वक व्यवहार, अच्छी परंपराएं, अच्छे संस्कार पिरो सकते हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास जागृत होता है। यह आत्मविश्वास उनके जीवन में आने वाले नकारात्मक भावों को सकारात्मकता में परिवर्तित करता है। सकारात्मक परवरिश बच्चों को सिर्फ यही नहीं बताती कि उसे क्या करना चाहिए अपितु उसे यह भी समझाती है उसे क्या और क्यों करना जरूरी है। इसलिए सकारात्मक परवरिश से बच्चे की क्षमता को पहचान कर आगे बढ़ाएं।
बच्चों की अच्छी परवरिश किसी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन यह नामुमकिन नहीं है। पहले संयुक्त परिवार होते थे। बच्चे दादा-दादी, बुआ, चाची से बहुत कुछ सीख लेते थे, लेकिन अब माता-पिता को ही अपने बच्चों के बारे में सोचना पड़ता है। ऐसे में कई बार वे बच्चों की परवरिश पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते हैं। ध्यान देने का मतलब ओवर या हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग नहीं है, ताकि बच्चा आत्मनिर्भर भी ना बन पाए, बल्कि पॉजिटिव पेरेंटिंग यानी सकारात्मक परवरिश। यह सर्व विदित है की सकारात्मक परवरिश पाने वाले बच्चों में अद्भुत कौशल विकसित होता है और वे जीवन में सफल होते हैं।
करें अपने अवगुणों का त्याग: बच्चे अपने माता-पिता द्वारा किए गए काम को बहुत ध्यान से देखते हैं और फिर वैसा ही करते हैं। अगर आप चाहती हैं कि आपका बच्चा अच्छा इंसान बने तो पहले आपको अच्छा इंसान बनना पड़ेगा। इसके लिए बच्चे के सामने हमेशा अच्छा व्यवहार ही करें। अपने दिमाग को शांत रखें। गलतियों को स्वीकार करते हुए अपने अवगुणों का त्याग करके भी बच्चे के सामने आदर्श माता-पिता का परिचय दे सकते हैं।
छोटी - छोटी जरूरी बातें: अच्छे माता पिता बच्चों को सिर्फ बड़ी ही नहीं बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदारियों के लिए भी तैयार करते हैं। इसलिए आप अपने बच्चों को छोटी-छोटी बातें जरूर सिखाएं। उन्हें बताएं कि क्यों साफ सफाई रखना बेहद जरूरी है। कैसे घर में रोज के कार्यों में माँ या भाई बहन को साथ देना चाहिए। अपनी चीजों को कैसे व्यवस्थित रखना चाहिए। बाहर जाते समय बड़ों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, उनकी बातें ध्यान से सुनना चाहिए। बड़ों की बातों के बीच में बोलना नहीं चाहिए।
गलती करने पर माफी: जाने अनजाने बच्चे से कोई गलती हो गई है तो उसे प्यार से समझाने की कोशिश करें, उसे डांटे नहीं। उसकी गलती को बार-बार याद ना दिलाएं। जिन बच्चों के घर पर ज्यादा पिटाई होती है वे बाहर भी ज्यादा मारपीट करते हैं। अगर आप के एक से अधिक बच्चे हैं तो ध्यान रहे कि कभी एक दूसरे से उसकी तुलना न करें। बल्कि किसी भी बच्चे से अपने बच्चे की तुलना ना करें। बच्चे को भावनात्मक चोट पहुंच सकती है और वह हताश हो सकता है। हर बच्चा खुद में खास होता है और सब में अलग-अलग गुण होते हैं।
बातचीत और मदद: चाहे कितना भी व्यस्त रहे मगर बच्चों को समय अवश्य दें। उनसे बातचीत करें और उनकी बात भी ध्यान से सुनें। उनकी समस्याओं में उनके दोस्त बनकर सलाह दें और परेशानी दूर करें तो वे दिल से आपकी बातों को समझेंगे और समस्या होने पर भी समाधान के लिए आपके पास आएंगे। दफ्तर से आकर बच्चों के साथ बैठे हैं, उनके साथ पार्क जाएं, उनकी पसंदीदा फिल्म देखें।
इंटरनेट का उपयोग: आपका बच्चा यदि मोबाइल इस्तेमाल करता है तो ध्यान दें कि वह कहीं मोबाइल पर कुछ गलत तो नहीं देखता या खोजता है। इन्टरनेट जानकारी देने के साथ-साथ खतरनाक भी है। इसलिए जब भी बच्चा इंटरनेट का इस्तेमाल करें तो आप उस पर कड़ी निगरानी बनाए रखें। इंटरनेट के इस्तेमाल के दौरान भले बच्चा वेबसाइट को सर्च करें मोबाइल फोन में किसी एप्लीकेशन को डाउनलोड करें चैट करें या फिर कोई वीडियो ही देखें लेकिन आप जिम्मेदारी से ना चुके और गलत उपयोग करने से होने वाले नुकसान की जानकारी भी उसे देती रहें ताकि आपका बच्चा हमेशा सावधानी पूर्वक इंटरनेट का उपयोग करें।
पॉजिटिव पेरेंटिंग का अर्थ है बच्चे का सही तरह से लालन-पालन। माता-पिता सकारात्मक विचारों से बच्चे में प्रेमपूर्वक व्यवहार, अच्छी परंपराएं, अच्छे संस्कार पिरो सकते हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास जागृत होता है। यह आत्मविश्वास उनके जीवन में आने वाले नकारात्मक भावों को सकारात्मकता में परिवर्तित करता है। सकारात्मक परवरिश बच्चों को सिर्फ यही नहीं बताती कि उसे क्या करना चाहिए अपितु उसे यह भी समझाती है उसे क्या और क्यों करना जरूरी है। इसलिए सकारात्मक परवरिश से बच्चे की क्षमता को पहचान कर आगे बढ़ाएं।

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