रामतीर्थ में वेदमंत्रों और शंखनाद के बीच हुआ मंगल पर्व का शुभारंभ; विभिन्न अखाड़ों के पूज्य संतों, महंतों और आचार्यों की उपस्थिति रही।
रामतीर्थ पर वेदमंत्रों की गूंज, शंखनाद से मंगल पर्व का शुभारम्भ; पूज्य संतों एवं महन्तों का दिव्य मेला
नासिक, ३१ अक्टूबर २०२६। चारों ओर पुष्प-वलयों से सजा रामतीर्थ, गोदावरी मैया के प्राचीन मंदिर के प्रांगण में दैदीप्यमान स्वर्ण धर्मध्वज स्तंभ, ब्रह्मवृंद के मुखारविंद से प्रस्फुटित होते वेदमंत्रों के मंगल स्वर, शहनाई और नगाड़ों की गूंज से आच्छादित संपूर्ण वातावरण… और इस ऐतिहासिक कालखंड का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से उमड़ा अपार जनसमूह! इसी अद्भुत, आलौकिक और चैतन्यमयी वातावरण में नासिक सिंहस्थ कुम्भ मेले का धर्मध्वजारोहण शनिवार को संपन्न हुआ। कुम्भ पर्व के हजारों वर्षों के इतिहास में यह प्रथम स्वर्णिम अवसर था, जब देश के राष्ट्रपति की धर्मध्वजारोहण समारोह में सहभागिता रही।
भारतीय सनातन परंपरा की पवित्रता और वैदिक संस्कृति के सात्विक सौंदर्य को सहेजते हुए इस समारोह का प्रत्येक अनुष्ठान अत्यंत श्रद्धाभाव से संपन्न हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के रामतीर्थ आगमन पर पुरोहित संघ के ब्रह्मवृंद ने ध्वज स्तंभ पूजन का विधिवत संकल्प कराया। राष्ट्रपति ने सर्वप्रथम यज्ञकुंड में पवित्र आहुति अर्पित की; तत्पश्चात जीवनदायिनी माँ गोदावरी का विधिवत पूजन कर धर्मध्वज को नमन किया।
जैसे ही धर्मध्वज गगन में फहराया, वैसे ही भीषण शंखनाद और ‘जय श्री राम’ एवं ‘हर हर महादेव’ के गगनभेदी जयघोष से संपूर्ण रामतीर्थ गूंज उठा। मंगल वाद्यों की ध्वनि के बीच उपस्थित जनसमुदाय ने भावपूर्ण मंत्र पुष्पांजलि अर्पित की। यज्ञाहुति, गोदा-पूजन और ध्वजारोहण के पवित्र अनुष्ठानों ने सिंहस्थ के शुभारम्भ को सनातन धर्म एवं आध्यात्मिक परंपरा का सुदृढ़ अधिष्ठान प्रदान किया। जनजातीय समाज की पावन पृष्ठभूमि से आकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ध्वजारोहण किया जाना एक ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व घटना है।
अद्भुत एवं दिव्य है ‘सिंहस्थ कुम्भ धर्मध्वजा’
सिंहस्थ धर्मध्वजा पर श्री गंगा-गोदावरी धर्मध्वजा के शुभ चिह्न एवं उनके विशुद्ध आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत सुंदरता से अंकित किए गए हैं —
- अमृतकलश : अमरत्व, मुक्ति और दिव्य शक्ति का प्रतीक।
- ओंकार (ॐ) : सर्वव्यापकता, सकारात्मकता और संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक।
- ‘श्री’ अक्षर : विजय, समृद्धि और मंगल का प्रतीक।
- १२ रेशमी घोंघे (गोंडे) : सामाजिक एकता और संगठित राष्ट्रशक्ति का प्रतीक।
- १ घंटा एवं ३ घुंगरू : नादब्रह्म और दिव्य ध्वनि का प्रतीक।
- ध्वजा का दूसरा भाग : माँ गोदावरी का वाहन ‘मकर’ (मगरमच्छ) तथा सूर्य-चंद्र के शुभ चिह्न उत्कीर्ण किए गए हैं।
पूज्य संतों एवं गणमान्य महानुभावों की गरिमामयी उपस्थिति
इस पावन अवसर पर विभिन्न अखाड़ों के पूज्य महन्तों, आचार्यों एवं साधु-संतों की वंदनीय उपस्थिति से कार्यक्रम ने अलौकिक आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त की। समारोह में जगद्गुरु श्रीमद् रामानंदाचार्य नरेंद्रचार्य जी महाराज, श्रीमहंत ज्ञानदास जी महाराज, मंगलपीठाधीश्वर श्री १००८ माधवाचार्य जी महाराज, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्रपुरी जी महाराज, श्री पंच निर्मोही अनि अखाड़ा के श्रीमहंत राजेंद्रदास जी महाराज, महंत संजयदास जी महाराज, श्रीमहंत मुरलीदास जी महाराज, श्रीमहंत वैष्णवदास जी महाराज, पंच दिगंबर अनि अखाड़ा के श्रीमहंत माधवदास जी महाराज, श्रीमहंत मोहनदास जी महाराज, महंत भक्तिचरणदास जी महाराज एवं महंत रामस्नेही जी महाराज सहित अन्य संत-महात्मा उपस्थित रहे। पौरोहित्य का दायित्व पुरोहित संघ के सतीश शुक्ल और अध्यक्ष चंद्रशेखर पंचाक्षरी ने निभाया।

IVSK




