सब जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन कौम के आधार पर हुआ था। भारत और पाकिस्तान के बनने की वजह धार्मिक रही। लेकिन आजादी एवं बंटवारे के सिर्फ पांच साल बाद ही पाकिस्तान में भाषा के आधार पर विभाजनकारी प्रवृत्ति बढ़ गई। जो मानते हैं कि कौमी आधार पर हुआ विभाजन ज्यादा मजबूत होता है, उसके लिए पाकिस्तान का बंटवारा एक उदाहरण है।
जन्म के बाद बच्चे को मां से दो उपहार मिलते हैं, दूध और उसकी जुबान..माता जिस भाषा में बात करती है, वही मातृभाषा होती है। मातृभाषा का विशेष महत्व है। मां की भाषा सीखने के लिए शिशु को गंभीर प्रयास नहीं करना पड़ता। वह उसे सहजता से वैसे ही सीखता चला जाता है, जैसे वह चलना, फिरना, बोलना, खाना आदि सीखता है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति के लिए दूध में घुले बताशे की तरह होती है। जिस तरह हमें सिर्फ दूध दिखता है, लेकिन उसे पीने के बाद उसमें घुली मिठास की अनुभूति होती है, मातृभाषा भी कुछ इसी तरह हमें जिंदगी में हर पल मिठास का अनुभव कराती है। इसीलिए मातृभाषा को लेकर दुनियाभर की संस्कृतियों में गहरा प्यार और स्नेह नजर आता है।
सब जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन कौम के आधार पर हुआ था। भारत और पाकिस्तान के बनने की वजह धार्मिक रही। लेकिन आजादी एवं बंटवारे के सिर्फ पांच साल बाद ही पाकिस्तान में भाषा के आधार पर विभाजनकारी प्रवृत्ति बढ़ गई। जो मानते हैं कि कौमी आधार पर हुआ विभाजन ज्यादा मजबूत होता है, उसके लिए पाकिस्तान का बंटवारा एक उदाहरण है। कौम एक होते हुए भी पाकिस्तान के दोनों हिस्सों पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान की भाषाएं अलग थीं। इसलिए पाकिस्तान के बंटवारे की नींव उसी दिन पड़ गई, जिस दिन पश्चिमी पाकिस्तान के वर्चस्ववादी शासकों ने पूरे पाकिस्तान के लिए उर्दू को राजभाषा की तरह थोपा। जनसंख्या के लिहाज से देखें तो अविभाविजत पाकिस्तान में 54 प्रतिशत लोग बांग्लाभाषी थे। उनमें से ज्यादातर पूर्वी पाकिस्तान के निवासी थे, जिसे 1971 के बाद से स्वाधीन बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है।
दरअसल पाकिस्तान में उर्दू को ही एक मात्र राजभाषा बनाने की तैयारी की गई। इसके पीछे केंद्रीय शिक्षा मंत्री फजलुर्रहमान की बड़ी भूमिका थी। इसके बाद पाकिस्तान के लोक सेवा आयोग ने विषयों की सूची से बांग्ला को हटा दिया। डाक टिकटों और मुद्रा से भी बांग्ला को हटा दिया गया। इससे पूर्वी पाकिस्तान में आक्रोश फैल गया। भारी संख्या में ढाका विश्वविद्यालय परिसर में 8 दिसंबर, 1947 को छात्र जुटे और बांग्ला को ही आधिकारिक भाषा बनाए रखने की मांग की। अपनी मातृभाषा के लिए इसके बाद छात्रों ने जुलूस और रैलियां जारी रखीं। लेकिन पाकिस्तान सरकार के कान पर जूं भी नहीं रेंग रही थी। इसके बाद 21 फरवरी 1952 को छात्रों ने सुबह करीब नौ बजे ढाका विश्वविद्यालय परिसर में सभा शुरू की। वहां पहले से ही धारा 144 लगी थी। तब विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर को लेकर पुलिस ने सुरक्षा घेरा बना रखा था। तब करीब ग्यारह छात्रों ने पुलिस के सुरक्षा घेरा को तोड़ने का प्रयास किया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। इस बीच पुलिस ने कई छात्रों को धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी से नाराज छात्रों ने पूर्व बंगाल विधान सभा को घेर लिया और विधायकों से इस मामले को विधानसभा में उठाने की मांग की। दूसरी तरफ छात्रों का एक समूह तूफान की तरह विधानसभा की इमारत पर चढ़ने लगा। उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और जिसमें कई छात्र शहीद हो गए। जिनमें अब्दुस सलाम, रफीक उद्दीन अहमद, अबुल बरकत और अब्दुल जब्बार शामिल थे। छात्रों की इस शहादत की खबर तेजी से फैली और शहर में हड़ताल हो गई।
जब बांग्लादेश बना तो 21 फरवरी को वह छात्रों के बलिदान दिवस को मनाने लगा। इसके बाद इसे अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का बांग्लादेश ने सुझाव दिया। काफी चर्चाओं के बाद इस विचार को यूनेस्को ने साल 1999 में 17 नवंबर को स्वीकार किया। इसके साथ ही दुनियाभर के लोगों को अपनी भाषाओं के प्रति जागरूक करने और उनके प्रति स्नेह बढ़ाने के उद्देश्य से बांग्लादेशी छात्रों के बलिदान दिवस 21 फरवरी के दिन हर साल अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का फैसला किया। इसके तहत पहली बार साल 2000 में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा मनाया गया। तब से हर साल यह परंपरा जारी है।
हमें अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर हमें जानना चाहिए कि दुनियाभर में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं और उनका क्या हाल है? संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में करीब 6900 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से लगभग 2680 भाषाएं यानी कि 43 फीसद खत्म होने की कगार पर हैं। माना जा रहा है कि जीवन में लगातार बढ़ती तकनीक और डिजिटल पैठ के चलते सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पुरानी भाषाएं तेजी से खत्म हो रही हैं। भाषा के जानकारों के मुताबिक हर महीने दुनिया भर से लगभग दो भाषाएं गायब होती जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की ही रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की करीब नब्बे प्रतिशत भाषाओं के बोलने वालों की संख्या एक लाख या उससे भी कम है। साल 1961 की जनगणना के मुताबिक, भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती हैं। जिनमें से कुछ पर खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का मकसद है, दुनियाभर की मातृभाषाओं के प्रति सम्मान बढ़े और उन्हें जिंदा रखने की कोशिश हो। उन्हें समृद्ध किया जाए।
आइए इस मौके पर हम अपनी मातृभाषा यानी मां से सहज मिली भाषा को बोलने, बचाने और उसे समृद्ध करने का संकल्प लें।

उमेश चतुर्वेदी




