दिल्ली प्रान्त संघ शिक्षा वर्ग (सामान्य) का 15 दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग वसंत विहार, दिल्ली में सम्पन्न हुआ। 159 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। समापन समारोह में मुख्य वक्ता श्री हरिश्चंद्र जी एवं मुख्य अतिथि डॉ. शैलजा गुप्ता जी ने व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्र निर्माण और पंच परिवर्तन के संदेश पर प्रकाश डाला।
दिल्ली, 21 जून 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रान्त के संघ शिक्षा वर्ग (सामान्य) – महाविद्यालयीन विद्यार्थी एवं तरुण व्यवसायी का समापन समारोह रविवार 21 जून 2026 को ललित महाजन विद्यालय, वसंत विहार में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख हरिश्चंद्र जी मुख्य वक्ता तथा IndCEPI की मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. शैलजा गुप्ता जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।
हरिश्चंद्र जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय कार्यों का अनुभव अत्यंत व्यापक और विलक्षण था। छात्र जीवन में नागपुर से दूर कलकत्ता में एमबीबीएस की शिक्षा प्राप्त करने गए। उनके कलकत्ता जाने का प्रमुख कारण केवल चिकित्सा अध्ययन नहीं था, बल्कि उस समय कलकत्ता क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र भी था। वहाँ उन्होंने अनुशीलन समिति से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा का निकट से अनुभव प्राप्त किया। साथ ही, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यों से भी जुड़े रहे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय विभिन्न विचारधाराओं, संगठनों और आंदोलनों का प्रत्यक्ष अनुभव अर्जित किया, जिसने उनके राष्ट्रचिंतन और संगठनात्मक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
डॉ. साहब ने सदैव व्यक्ति निर्माण को अपने कार्य का केंद्रीय आधार माना। उनका दृढ़ विश्वास था कि सशक्त चरित्र, उच्च नैतिक मूल्यों और राष्ट्रनिष्ठा से युक्त व्यक्तियों का निर्माण ही राष्ट्र की प्रगति एवं उत्थान का वास्तविक मार्ग है। उनके अनुसार, जब व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है, तभी एक सुदृढ़, संगठित और समृद्ध राष्ट्र की स्थापना संभव होती है।
संघ शताब्दी वर्ष की चर्चा करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि वर्तमान में संघ का कार्य देशभर में व्यापक रूप से विस्तार प्राप्त कर चुका है। संघ की 83 हज़ार से अधिक दैनिक शाखाएँ संचालित हो रही हैं। इसके अतिरिक्त, 1 लाख 30 हज़ार से अधिक सेवा-परियोजनाएँ समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं। ये आँकड़े समाज-निर्माण, सेवा और संगठन विस्तार के प्रति संघ की सतत प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करते हैं। संघ परंपरा में जयघोष का विशेष महत्व है। संघ ने कभी अपने संगठन के नाम का जयघोष नहीं किया, बल्कि सदैव “भारत माता की जय” को ही आधार बनाया है। यह संघ की उस मूल भावना का प्रतीक है, जिसमें संगठन स्वयं को राष्ट्र और समाज से ऊपर नहीं मानता।
संघ की कार्यपद्धति में किसी उपलब्धि का श्रेय स्वयं लेने की प्रवृत्ति नहीं है। उसका दृढ़ विश्वास है कि उसके सभी कार्य समाज की सज्जन, जागरूक और राष्ट्रनिष्ठ शक्तियों के सहयोग एवं सहभागिता से ही संपन्न होते हैं। इसलिए किसी भी सफलता का वास्तविक श्रेय समाज को ही प्राप्त होना चाहिए। संघ का गौरव इसी तथ्य में निहित है कि उसके द्वारा प्रेरित एवं संगठित सज्जन शक्ति समाज-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण के विविध कार्यों को संपन्न करती है। समाज की जागृत एवं संगठित शक्ति ही संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि और वास्तविक प्रतिष्ठा है।
उन्होंने जीवन में पंच परिवर्तन यानी सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली, नागरिक कर्तव्य पालन एवं स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम को मुख्य अतिथि IndCEPI की मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. शैलजा गुप्ता जी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा – संघ शिक्षा वर्ग में उपस्थित होकर प्रेरणा मिली। किसी भी संगठन की शक्ति उसके कार्यकर्ताओं के चरित्र, अनुशासन और राष्ट्रहित के प्रति उनकी निष्ठा में निहित होती है। समय का सदुपयोग, दायित्वों के प्रति पूर्ण समर्पण तथा सामूहिक भावना से कार्य करने की प्रवृत्ति ही व्यक्ति और संगठन दोनों को सफलता के शिखर तक पहुँचाती है।
उन्होंने कहा कि घोष केवल संगीत का माध्यम नहीं है, बल्कि वह संगठनात्मक अनुशासन, सामूहिक समन्वय, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का सशक्त प्रतीक है। घोष के माध्यम से स्वयंसेवकों में एकरूपता, सामूहिकता और कर्तव्यनिष्ठा का विकास होता है। घोष की स्वर-लहरियाँ भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं का स्मरण कराती हैं तथा समाज में सकारात्मक ऊर्जा और राष्ट्रभक्ति का संचार करती हैं। संघ का घोष संगठन की जीवंतता और उसके सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक है, जो प्रत्येक स्वयंसेवक को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता है।

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