राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि के प्रति समर्पण भावना को सुदृढ़ करते हैं संघ गीत – पराग अभ्यंकर जी

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शताब्दी वर्ष पर ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम का आयोजन; स्वयंसेवकों ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में 100 से अधिक गीत प्रस्तुत किए।

भुवनेश्वर, 2 सितंबर 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग ने ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम का आयोजन किया। भुवनेश्वर स्थित बुद्ध मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में 105 स्वयंसेवकों ने 100 से अधिक राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने ओड़िया के साथ-साथ हिंदी, संस्कृत, बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम और पंजाबी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के गीत प्रस्तुत किए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर जी ने कहा कि संगीत केवल स्वर और ताल का संयोजन नहीं है, बल्कि यह मन में भावनाओं को जागृत करने का प्रभावी माध्यम भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत केवल मनोरंजन या मन को प्रसन्न करने के लिए नहीं होते। इन गीतों के शब्द और उनमें निहित भाव स्वयंसेवकों के भीतर राष्ट्रप्रेम, समर्पण और मातृभूमि के प्रति सेवा की भावना को मजबूत करते हैं। संघ की शाखाओं में मातृभूमि भारत की आराधना की जाती है और स्वयंसेवक गीतों में व्यक्त भावों को आत्मसात करते हुए राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण को निरंतर बढ़ाता है। गीतों के माध्यम से लोगों के भीतर राष्ट्र के लिए कार्य करने की प्रेरणा उत्पन्न की जा सकती है।

पराग जी ने कहा कि एकाम्र क्षेत्र भगवान शिव की नगरी है और भारतीय परंपरा में भगवान शिव को संगीत का जनक माना जाता है। ऐसे में संघ शताब्दी वर्ष के दौरान भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग द्वारा इस तरह का आयोजन किया जाना अपने आप में विशेष और अनूठा प्रयोग है। इस प्रकार की पहल को आगे किस तरह विस्तारित किया जाए, इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है।

उन्होंने स्वयंसेवकों के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि संगीत के माध्यम से समाज के प्रत्येक हृदय में राष्ट्रसेवा की भावना को मजबूत करने के ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए। महाप्रभु लिंगराज की इस पवित्र धरती पर आयोजित यह पहल विशेष महत्व रखती है।

उद्घाटन अवसर पर ओडिशा (पूर्व) प्रांत के प्रांत बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम की तैयारी अप्रैल माह से चल रही थी। इस अनूठे कार्यक्रम की मूल कल्पना संघ के बौद्धिक विभाग की अखिल भारतीय गीत टोली के सदस्य असित वरण महापात्र की थी। हालांकि वे कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन बेंगलुरु में रहते हुए भी उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से आयोजन की तैयारियों और इसे सफल बनाने में सहयोग किया।

तन्मय महापात्र ने बताया कि संघ की शाखाओं में सामान्यतः स्वयंसेवक बिना वाद्य यंत्रों के गीत गाते हैं। इस कार्यक्रम में पहली बार स्वयंसेवकों ने वाद्य यंत्रों के साथ सामूहिक रूप से गीत प्रस्तुत किए। बिना वाद्य यंत्रों के अभ्यास करने वाले स्वयंसेवकों के लिए अचानक वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति देना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। भुवनेश्वर महानगर के स्वयंसेवकों ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया। कार्यक्रम में सात वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की आयु के स्वयंसेवकों ने भाग लिया।

आठ भारतीय भाषाओं में राष्ट्रभक्ति गीतों की प्रस्तुति

कार्यक्रम की विशेषता इसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी रही। स्वयंसेवकों ने ओड़िया के अलावा बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम, पंजाबी, हिंदी और संस्कृत सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में गीत प्रस्तुत किए। इन गीतों को विभिन्न तालों और संगीत शैलियों के अनुरूप तैयार किया गया था। कार्यक्रम की संगीत संरचना और प्रस्तुतियों को तैयार करने में भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक प्रमुख और उनके सहयोगी कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कार्यक्रम की शुरुआत 100 स्वयंसेवकों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन से हुई। इसके बाद विभिन्न आयु वर्ग के स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुति दी।

संघ शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवकों का यह सामूहिक प्रयास देशभर में अपनी तरह की एक अनूठी पहल है।

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