केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जी ने कहा कि आरएसएस 100 वर्षों से अनवरत देश और समाज की सेवा का कार्य कर रहा है। स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। डॉक्टर हेडगवार जी भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी स्वयंसेवकों ने क्रांतिकारियों को अपने घरों में शरण दी थी। महाराष्ट्र के चिमूर और आस्ती में स्वयंसेवकों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष भी किया था।
नई दिल्ली, 20 जुलाई 2026। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी ने उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी द्वारा लिखित पुस्तक “आरएसएस @100: एक सदी संकल्प की” का विमोचन किया।
कार्यक्रम में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जी ने कहा कि आरएसएस 100 वर्षों से अनवरत देश और समाज की सेवा का कार्य कर रहा है। लेकिन उसके बारे में आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग या तो अन-इंफॉर्म है या मिस-इंफॉर्म है। मैं इसके कुछ उदाहरण देता हूं। लंबे समय तक बार-बार यह झूठ दोहराया गया कि संघ का स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें इस पुस्तक का चौथा चैप्टर पढ़ना चाहिए। उन्हें वास्तविकता का पता लग जाएगा। उन्हें पता लग जाएगा कि स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। डॉक्टर हेडगवार जी भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी स्वयंसेवकों ने क्रांतिकारियों को अपने घरों में शरण दी थी। महाराष्ट्र के चिमूर और आस्ती में स्वयंसेवकों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष भी किया था।
उन्होंने कहा कि सत्य यह है कि संघ की विचारधारा भेदभाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता और राष्ट्रीय एकता पर आधारित है। संघ का विचार ‘सहिष्णुतावाद’ से भी आगे ‘सम्मानवाद’ का है। संघ ने हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम’ के भाव से कार्य किया है। यही कारण है कि आज आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वयंसेवी संगठन बन चुका है। हाल ही में कांग्रेस के एक बड़े नेता ने पूछा कि RSS Registered क्यों नहीं है। ऐसी बातों का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संविधान प्रत्येक नागरिक को संगठन बनाने का अधिकार देता है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि माँ के प्रेम का कोई लाइसेंस नहीं होता। गुरु के संस्कार किसी सरकारी मुहर के मोहताज नहीं होते। माँ गंगा को बहने के लिए लाइसेंस नहीं चाहिए और सूर्य को प्रकाश देने के लिए Registration की आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार RSS एक Civilisational Force है, जिसे किसी Certification या Validation की आवश्यकता नहीं है। संघ निरंतर “सेवा धर्मः, परमः श्रेयः” की भावना के साथ कार्य करता आया है और करता रहेगा।
उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति का मूल्यांकन उसके Religion से नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उसके समर्पण से करता है। उसका विचार एकरूपता का नहीं, बल्कि एकात्मता का है। यही भावना ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्शों के साथ सामंजस्य, सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाती है। देश विभाजन की विभीषिका से लेकर 1962-65 के युद्ध, कश्मीर, गोवा, दादरा-नगर हवेली और 1975 के आपातकाल तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हर विषम परिस्थिति में राष्ट्रहित, सेवा और लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि संघ का मंत्र है – ऊँ राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम्, जो कुछ भी है राष्ट्र का है, मेरा कुछ नहीं है। संघ का प्रत्यक स्वयंसेवक इसी संकल्प के साथ कार्य करता है कि मेरा कुछ भी नहीं है, कुछ है तो सब राष्ट्र को समर्पित है। उसे किसी पद या प्रतिष्ठा की लालसा नहीं रहती। इसलिए जो संस्था सेवा आत्मत्याग और समर्पण के आदर्शों पर चलती है और जिसके कार्यकर्ताओं का ध्येय पवित्र होता है, वहां विभाजन नहीं होता है। केवल संयोजन होता है। उस संस्था के लोगों को प्रसिद्धि और पुरस्कार की लालसा भी नहीं रहती है।
जब शताब्दी वर्ष का समय आया, तब भी आरएसएस ने यही कहा कि यह उत्सव मनाने से अधिक आत्ममंथन और आत्मचिंतन का अवसर है। शताब्दी वर्ष का उत्सव नहीं मनाया। इस अवसर पर संघ ने पांच प्रण समाज के समक्ष रखे। इनका उद्देश्य ऐसा समाज बनाना है जो संस्कारित भी हो, समरस भी हो, आत्मनिर्भर निर्भर भी हो, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भी हो और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग भी रहे। मेरे अनुसार, पांच प्रण विकसित भारत के पांच आधार स्तंभ कहे जा सकते हैं।

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