राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण समाज का संगठन है, सम्पूर्ण समाज एकात्म भाव से एकत्र हो, यही संघ कार्य की भावना है। संघ भारत का ‘स्व’ है।
काशी,10 सितंबर 2026। संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त काशी महानगर द्वारा आयोजित प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण समाज का संगठन है, सम्पूर्ण समाज एकात्म भाव से एकत्र हो, यही संघ कार्य की भावना है। संघ भारत का ‘स्व’ है।
उन्होंने कहा कि हमारी पहचान आध्यात्मिक है और इसी का नाम हिन्दुत्व है। संघ समाज जागरण, समाज परिवर्तन एवं व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है। इस कार्य में समाज के प्रत्येक जन मानस की सहभागिता आवश्यक है। हम यह नहीं कह सकते कि हमें समय की कमी है। क्योंकि जिस प्रकार मछली पानी में रहती है, उसी प्रकार हम समय के मध्य में रहते हैं। धर्म की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में धर्म, ‘रिलीजन’ शब्द का अर्थ नहीं है, समाज को देना चैरिटी है और समाज को वापस लौटाना यह धर्म है। धर्म बांटता नहीं है, अपितु बांधता (जोड़ता) है।
मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि भारत में ‘रिलीजन’ का अर्थ उपासना हो सकता है। विविधता में एकता, अनेकता में ऐक्य देखना, यही भारत का अन्तर्निहित धर्म है। व्यक्ति धर्म प्रवण बने और समाज धर्म आधारित हो, तब राष्ट्र बलवान होगा। प्राचीन भारत के वैभव का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ल्ड हिस्ट्री ऑफ इकॉनोमिक्स पुस्तक में उल्लेखित है कि ईस्वी सन् 1 से 1700 तक विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 33 प्रतिशत रही। चमड़ा उद्योग, धातु उद्योग, इत्र उद्योग, वस्त्र उद्योग में भारत विश्व में प्रमुख स्थान रखता था। महिलाएं घरों में उद्योग सम्भालती थी एवं पुरुष वर्ग वस्तु बेचने बाहर जाते थे। घर की सम्पदा का नियंत्रण घर की गृहणी के हाथ में था, इसी कारण महिलाएं गृह लक्ष्मी कही जाती थी। के. एम. मुंशी द्वारा लिखित पिलग्रिम टू फ्रीडम पुस्तक के अनुसार भारत का निर्यात ज्यादा था, आयात कम था। भारत के मन्दिर समाज के समृद्धि का केन्द्र थे। भारत में महिलाओं की स्थिति पर उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं की स्थिति आदिकाल से पुरुषों के समकक्ष रही है।
जिज्ञासा समाधान सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत दुनिया में अकेला राष्ट्र है जो अपने दो नामों के साथ आगे बढ़ रहा है। जबकि बर्मा ने स्वतंत्रता के पश्चात अपना नाम म्यांमार स्वीकार कर लिया। हम कौन हैं, जब तक यह तय नहीं होगा। हम अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर सकते। स्व को नकारने की आदत प्रगतिशील बौद्धिकता के नाम पर भारत में स्वीकार की जाती रही है। परन्तु वर्तमान में वातावरण बदला है। राष्ट्रपति जी के आधिकारिक पत्र पर ‘इण्डिया’ के स्थान पर ‘भारत’ का प्रयोग हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज भारत शब्द के प्रयोग को अपने दैनिक जीवन में स्वीकार करे, तब हमे ‘इण्डिया दैट इज़ भारत’ नहीं कहना होगा।
कार्यक्रम अध्यक्ष सनबीम शिक्षण समूह के निदेशक दीपक मधोक ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र का प्रमुख रक्षक है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा। शिक्षा द्वारा भारत की सेवा ही व्यक्ति का एकमेव ध्येय होना चाहिए। कार्यक्रम के प्रारम्भ में निवेदिता शिक्षा सदन की छात्राओं ने राष्ट्रगीत वन्देमातरम का गायन किया। काशी विभाग के विभाग संघचालक प्रो. जयप्रकाश लाल जी सहित मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन किया।

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